गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

16-जो तुम्हें आ जाए पसंद



16-जो तुम्हें आ जाए पसंद

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Saturday, November 13, 2010 at 11:44pm ·
खोजता हूँ मै वही छंद
जो तुम्हें आ जाए पसंद
 निर्झर का हो या
नदी का बहता हुआ जल
नृत्य की विभिन्न मुद्राओं में खड़े
वृक्षों से भरा हुआ हो चाहे जंगल
 मचलती हुई मंझधार से दौड़ती हुई
मुझ तक आती हो
चाहे हर बार एक नयी लहर
खीजता हूँ मै उनमे वही लय ,वही धुन
जो तुम्हें आ जाए पसंद

इसलिए लिखते रहता हूँ
शब्दों कों मन के कोरे पन्नों में निरन्तर
अब लगता नहीं मुझे बाहर और भीतर में कोई अंतर

चाहे मौन रहता आया हों
सदीयों से वह अड़ा हुआ प्रस्तर
लेकिन प्रणाम कर ..उससे कहता हूँ ...
दे दो स्वयं के ज्ञान कों निचोड़ कर
वें शब्द जिनसे
मैं रच लूँ ..अपनी प्रियतमा के लिये एक अनूठा उत्तर

रेत पर बिछी जल की गीली परत
के दूर तक फैले आँचल के एक छोर कों पकड़ कर 
 कहता हूँ -तुम तो नदी संग आकर पा गयी हो सागर ..
.मुझे भी तो सिखलाओं कोई मंतर

प्रेम करने के लिये मेरा मन भी हो गया हैं अब तत्पर
 कट गयी हैं अब लहलहाती हुई पकी फसल
खेतों के मन में
बची हुई शुष्क जड़ों सी टीस आयी है उभर
इसलिए उनसे अभी छंद या अलंकार के विषय में
न जानूं यही होगा मेरे लिये बेहतर

कहता हैं मुझसे मौसम
कुछ जाओं ठहर
आयेगी ऋतु  लिये अपने संग बसंत
खोज लेना तब वही लय ,वही धुन
जो तुम्हें आ जाए पसंद

खोजता हूँ मै वही छंद
जो तुम्हें आ जाए पसंद

 किशोर कुमार खोरेन्द्र 



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