गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

15-घर ही है -असली तपोवन -



15-घर ही है -असली तपोवन -

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Friday, November 12, 2010 at 2:13pm ·

 कभी मै ...चश्मे या रुमाल सा -घर में ही खो जाया करता हूँ
सोफे या दीवान पर -किताबो सा चिंतित ,पड़ा  रह जाया करता हूँ
अखबार के दुखी पृष्ठों पर -छपे खबरों सा ,कभी बिखर जाया करता हूँ
 और तुम ...मुझे ढूढ़ लिया करती हो ,
समेट लिया करती हो
जन्म से मृत्यु तक की इस यात्रा में
मै कितना सच हूँ या कितना झूठ ...अब तक जान नही पाया.........
 परन्तु मानों ,मै दीपक होऊं ,और ................
बुझने से मुझे बचाने में लगी तुम्हारी उंगलियों .सा मै भी नुकीली लौ की आंच को -
चुभता हुआ -महसूस कर रहा होऊ
 हमेशा प्रेम के इस आग को -निष्काम भाव के इस तपन को
-प्यास लगने पर -तुम और मै -सदेह ...
अमृत की तरह पी जाया करते हैं
 टस से मस् नही होने वाले -एकांत के ..ऊँचे पहाड़ों के शिखर से -
 जंगल से भी ज्यादा घने -अकेलेपन के दर्द से -
 सूनी और मौन -पटरीयो पर ...ट्रेन की तरह दौड़ता हुआ ...प्राय:उस स्वप्नमय बीहड़ से -
 घर लौट आया करता हूँ -तुम्हारे पास
 मुझे मालूम है घर ही है -असली तपोवन -
 स्नेह ,ममता ,आस्था --को पाकर साकार खिलते है -
भविष्य के सुमन
 प्रेम है -स्वजन के समक्ष -अपना ............?
एक् सजीव मानसिक परम आत्म समर्पण -
स्वयं का -.....अंहकार का विसर्जन
 *किशोर कुमार खोरेन्द्र
 

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