रविवार, 9 दिसंबर 2012

135-मैं ही तुम्हारा प्रेम हूँ प्रत्यकक्ष



135-मैं ही तुम्हारा प्रेम हूँ प्रत्यकक्ष

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Wednesday, August 24, 2011 at 7:33pm ·



तुम कहती हो अब
तुम्हें किसी कारणवश
मुझसे होना होगा अलग
 जबकि -
तुम्हारे प्यार का
मैं हो चुका हूँ अभ्यस्त

 तुम्हारा यह व्यवहार नहीं हैं तर्कसंगत
पतझड़ से पराजित वृक्ष की तरह
खड़ा हूँ
तुम्हारे समक्ष मै नतमस्तक

मन में मैंने
न जाने कितने सपने सजोये हैं
टूट जायेंगे वे समस्त

 सोचा था ...चांदनी रात में झील की सैर करेंगे
भोर की लालिमा के पानी में घुल जाने तलक

 चोटी तक पहुँचने  के खातिर
संग संग सीढियों कों तय करेंगे
छू लेगा तब झुककर
हमें फ़लक

 बरगद की घनी छाँव तले
निहारेंगे एक दूजे कों घंटों एकटक

 हाथों में हाथ लिये
करेंगे भ्रमण
सडकों पर बेमतलब

 पके आमों की तरह अमराई से चुरायेंगे
सुनसान पलों से घिरे एकांत कों बेखटक

 लेकिन
तुम्हारे द्वारा किया गया
मुझे त्याग कर जाने का निर्णय
चुभा रहा हैं
मेरे मन में नुकीले नश्तर
 मुझे जड़ों तक कर जाएगा
तुम्हारा वियोग ध्वस्त

अब कैसे होंगे भविष्य के
मेरे मार्ग प्रशस्त

 तुम बिन
किसके पास करूंगा ....
कविताओं के जरिये ......
अपने मौन कों अभिव्यक्त...?

 मेरे जीवन का तुम सूर्योदय हो
जो होना चाहती हो अस्त

 मैं ही तुम्हारा प्रेम हूँ प्रत्यकक्ष
तुम्हारे प्यार का हो चूका हूँ
मैं अभ्यस्त
 किशोर  कुमार खोरेन्द्र
 
{कभी कभी मेरी धर्म पत्नी कहती है ..ईश्वर  के प्रति अपने प्रगाढ़ प्रेम के वशीभूत ..की ..मैं यह दुनियाँ छोड़ जाउंगी
उसी भाव पर आधारित यह कविता }




1 टिप्पणी:

"Nira" ने कहा…

waah waah kya kahne ati prem bhari rachna