गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

13-रास्ते लौटने लगते है



13-रास्ते लौटने लगते है

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Tuesday, November 9, 2010 at 1:25pm ·
'रास्ते लौटने लगते है"

 किसी उपन्यास के सुखद अंत को  
कोई नही जी पाता
 हर पल कौरवों की भीड़ के साथ -हमें रौंदता हुआ
निकल जाता है
 सचमुच सच के करीब पहुँचने से पहले ही
 रास्ते लौटने लगते हैं
सच .........!
एक् जंगल की तरह हैं जहाँ टूटकर गिरते हुए
 किसी पत्ते की आवाज साफ सुनायी देती हैं
जहाँ
उगता हुआ नन्हा पौधा सूरज को प्रणाम करते ही यह जान जाता है
 -कि.......
इस उजाले पर सबका एक समान अधिकार हैं
 सच .............!
जंगल की एक अनाम ........
पगडंडी की तरह हैं
जहाँ ...........
पर पहुंच कर सारे आकार ...
निराकार हो जाते है
न नाम ,न धर्म .....
यहाँ तक की मनुष्य अपने कपड़ो की तरह
अपनी देह को भी उतार कर मुक्त होने लगता है
 सबसे वह प्रेम करने लगता हैं .......
चिड़ियाँ की चोंच में वह धान की सुनहली बाली सा फँसा हुआ ......
खुश होने लगता है
मुंह खोल गर्दन उठायी हुई शिशु चिड़ियों पर
नन्हे दानों की तरह टपक पड़ता है वह
 सच में .......
सचमुच तब
करूणा से भर उठता हैं
सबका मन
* किशोर कुमार खोरेन्द्र 



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