रविवार, 9 दिसंबर 2012

125-बची हैं वो एक कविता ........



125-बची हैं वो एक कविता ........

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, August 14, 2011 at 12:43am ·




इतनी सारी कविताएं लिखने के बाद भी
 बची हैं वो एक कविता ........
जिसे लिखना हैं मुझे तुम पर
पता नहीं वह कैसी होगी

बादलों के अक्स बनेगे अक्षर
तब क्या ..नभ पर

इंद्र धनुष के रंगों से नहायेंगे  वातावरण
जमीन पर

तुम अपनी देह रूपी  आवरण कों हटा कर
बाहर आओगी
सचमुच में .....
तब घूमने
सरोवर या अमराई के किनारे से
अपनी यात्रा पर निकले उसी .....पथ पर

वृक्षों की डालियों पर
तुम पर फ़िदा-
किसी युवक के -नाखूनों से
अंकित तुम्हारे नाम........
तब .....तुम्हारा स्वागत करेंगे

कोई एक विस्मृत चेहरा
तुम्हारे सम्मुख आकर तुमसे कहेगा
मैं वही हूँ
क्या तुमने पहचाना मुझे.....?

किशोर

कोई टिप्पणी नहीं: