शनिवार, 8 दिसंबर 2012

119-एक झीना सा आवरण




Saturday, August 6, 2011



बिना किये तुम्हारा  दर्शन
सूनी लगती हैं धरती
सूना लगता हैं अंबर

माना की तुम मेरे लिये
सिर्फ एक ख्याल हो
वैसे भी जीवन भी तो हैं एक सपन

कितना भी चाहों
दूरी बनी ही रहती हैं
इस जग में नहीं हो पाता हैं
अदृश्य से साकार मिलन 

बीच में रहता ही हैं
एक झीना सा आवरण

बहुत ठोस हुआ करता हैं
निज का दर्पण

पिघल कर कौन कर पाता हैं
प्रेम के वशीभूत
निराकार के समक्ष ..अपना समर्पण
किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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