शनिवार, 8 दिसंबर 2012

111-छलक रहा सौन्दर्य का अमृत



111-छलक रहा सौन्दर्य का अमृत

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Monday, August 1, 2011 at 2:56pm ·



कभी कमीज की बाँह थाम लेते हैं
बबूल के कांटें

नुकीली पत्तियों के
चुभने से ......
पीठ ...नहीं स्वयं कों हैं रोक पाते

पैरों कों सहना पड़ता हैं
धंस धंस कर
मेढ़ की आधाते

करना चाहते हैं
खेत पर उगे हुए
धान के पौधे मुझसे कुछ बाते

बहता हैं पानी कल ..कल ..
अनजानी हैं उसकी राहे

पीले पीले फूलों से
सजे हैं टेड़े मेड़े साये

लबालब हर ओर सावन भरा हैं
देख देख कर भी
प्रकृति की हरियाली
थकी नहीं हैं मेरी आँखे

भरी हुई गागर सी लग रही हैं वसुंधरा
छलक रहा सौन्दर्य का अमृत
कैसे भरूँ   अब ...उड़ान
प्रेम रस से भींग गयी हैं मेरी पाँखे

किशोर कुमार खोरेन्द्र 

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