बुधवार, 5 दिसंबर 2012

01-मै लिखता रहूँ चुपचाप


मै लिखता रहूँ चुपचाप

2012/12/6 kishor kumar <kishork630@gmail.com>

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Tuesday, October 26, 2010 at 2:03am ·

मै लिखता रहूँ चुपचाप


देखता रहूँ फैली मधुर चांदनी रात
झील की लहरे भी
निहारती रहे मुझे 
 जल -निम्गन चाँद के साथ
 मैं लिखता रहूँ चुपचाप

 सुखदायी हवा बहे तो
 वृक्ष की पत्तियाँ पूछे -
 पगडंडियों पर कराहती-
 धूल की परतो से -कैसी लग रही हैं
 किरणों की स्निग्ध ,
शीतल मरहम पट्टियों की 

यह श्वेत मीठी आंच
 मैं लिखता रहूँ चुपचाप

 बुलाकर बिठा समीप
 कहती ..बहती नहर श्लील 
 बात एक ख़ास
परिश्रमी हैं यहाँ सभी
 प्रेम के लिए
 लोगो को
कहाँ मिल पाता है अवकाश
   मैं लिखता रहूँ चुपचाप


 दूर वन के कोने में
 मौन के वृहत सूने में
 ऊग कर पत्थरो के सीने में
 प्यार के विनम्र दूब कर रहे विश्राम
 जरुरत हो तब
 ख़ुद आयेगा
 शहरो की सडको पर भटकता
 अकेले पन का शिकार -
 हर रेगिस्तान
 मैं लिखता रहूँ बस ..चुपचाप
*किशोर




2 टिप्‍पणियां:

वीना ने कहा…

इतना प्यारा समां हो तो भावनाएं तो मचलेंगी ही...

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

वीना जी बहुत शुक्रिया