शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

निहारते रहना चाहता हूँ

निहारते रहना चाहता हूँ


तुम्हारे ह्रदय के

कोमल अहसासों से बनी

घाटियों से

एक प्यार की नदी

उतरकर

मुझ तक पहुंचती है

और

भावनाओं से भींगे

रेत के समतल तट पर

हरे हरे

नन्हे पौधों के सदृश्य

मैं .....

ऊग आता हूँ

तुममे व्याप्त

दर्द से युक्त ..

जल की प्यास बुझाने के लिये

मेरी जड़ो से निसृत

मिश्री कणों से निर्मित

शब्दों से -सृजित ...

कविता की तरह

तुम्हारी आँखों की तरल नमकीन देह में

मैं

घुल जाना चाहता हूँ

हालाँकि -

सुविचारो के घुमड़ते श्वेत बादलो की तरह

तुम्हारे समीप से भी

मैं

गुजरता हूँ

पर

तुम्हारे मन के घर की

एकाग्रचित

खिड़कियाँ ध्यानमग्न है

इसलिए -

तुम मुझे न देख पाती हो

न मेरे पांवो की

धीमी आहट को

सुन पाती हो

और .......

मैं भी तुम्हे

सुकून के छत पर

सुखद समीर के संग

बैठे रहने देना चाहता हूँ

तुम्हारी एकाग्रता को बिना भंग किये ........

तुम्हे एक् खूबसूरत

सजीव

प्रतिमा की तरह

बस .......

निहारते रहना चाहता हूँ

किशोर

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