गुरुवार, 29 नवंबर 2012

"तुम और मैं "

"तुम और मैं "

शब्दों के जरिये
किस तरह से करूँ
तुम्हारे और मेरे मध्य के
निश्छल सम्बन्ध को मैं प्रकट
यही सकता हूँ कह
की तुम यदि बहती हुई
निर्बाध नदी हो मेरे निकट
तो मैं हूँ
तुम्हे अपनी बांहों में

समेटे हुए का अहसास लिया हुआ सा
सूना सूना सा विस्तृत एक खामोश तट

तुम्हारे पास अपनी एक धुन हैं
स्वकछन्द गति में लय हैं बेहद
चाँद ,सितारें ...जंगल
पर्वत हो या सूरज
उन्हें स्वयं में अपनी परछाई बना
सभी को कर देती हो तुम .. मुखर
और मैं तुम्हे निहारते हुए एकटक
कुछ कहते कहते
अक्सर जाया करता हूँ अटक

कटोचता हैं मुझे
तुम्हे पाकर भी .,..
न पा सकने की असमर्थता
भीतर भीतर
पराजित कामना बन उत्कट

उछलती हैं तुम्हारी खुशियों की लहर
मोड़ पर आये चाहे कितनों प्रस्तर
हो ही जाती हो कठिनाईयों से मुक्त
चाहे घेर ले तुम्हे अनेकों फेनील भंवरों के हठ

तुममे घुली हैं चांदनी की छटा ..अनुपम
हे प्रकृति रूपी नदी ....
मैं तुम्हारे अदभूत सौन्दर्य का मूक साक्षी हूँ
इसीलिए ..मेरी पुकार को तुम
सुन नहीं पाती हो
बस गूंजते हैं ...नि:शब्द ,नि:स्वर
मौन के निखिल एकांत में
मेरे क़दमों के ..विचलित आहट
किशोर कुमार खोरेन्द्र

2 टिप्‍पणियां: