शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

11-07-12
तुमने ठीक ही कहा था

तुमने ठीक ही कहा था
आदमी अकेला नहीं होता
उसके साथी उसके विचार होते हैं
लेकिन तुम मेरे विचारों में
एक एक कर
शब्दों की तरह क्यों आ रही हो
मुझे न किसी वृक्ष की याद आई
न कोई रास्ता दौड़कर
मेरे पीछे पीछे आया
इस जीवन का अंतिम लक्ष्य
नहीं चाहूँ तब भी मृत्यु कों पा लेना ही हैं
मुझ अपरिचित से ,अजनबी से ,बूंद में
तुम्हारी उपस्थिति ..
जाने पहचाने महासागर की लहरों की
विशाल बाँहों की तरह लग रही हैं
मेरे ख्यालों के बिखरे हुए
कण कण में तुम ..
पहाडो की सुरम्य घाटियों सी
पसरी हुई लग रही हो
यदि मै विचारों कों झटक भी दूँ
तो तुम
मेरे शून्य की परिधि का
केंद्र कयों बनती जा रही हो

मै जितना सिमट कर सूक्ष्म से सूक्ष्मतर
होने की कोशिश कर रहा हूँ
उतनी ही तुम
मुझे आकाश में उड़ते हुए बादलों से मिलकर
बनी हुई एक आकृति की तरह
भव्य और सुंदर लग रही हो
शब्दों से ,शून्य से
परे भी कोई रिश्ता होता हैं ,,?
जिसका कोई नाम नहीं होता
किशोर

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