शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

09-07-12
मैं हूँ कवि 

मै यदि
लहर हूँ ...
तो तुम हो नदी
तुम अक्षर हो
तो मैं हूँ कवि

प्यार से भींगी हुई

धूप पसरी हैं
कुछ देर के लिये ही सही

मुझ धुंध की बाँहों में समा जाओं

तुम फूलों से संवरी हुई
एक हो टहनी

मुझ प्यासे तिनके के लिये

तुम शबनम की बूंद बनी

सावन के बादलों सा

तुम्हें निहारने वादियों में
उतर आया हूँ
पर तुम
गुलमोहर की
पंखुरियों सी हो दहक रही

मौन का रंग बिखर आया हैं

खामोशी की सुगंध फ़ैल गयी हैं
मै यदि
गुनगुनाता मधुप हूँ
तो तुम हो
गीत सुनने के लिये आतूर
नाजुक कली

सुबह जन्मा था

शाम कों हो जायेगी मृत्यु
प्रेम के उस अमृत कों पी लो
वैसे भी निमिष भर की हैं जिन्दगी
किशोर

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