सोमवार, 13 अगस्त 2012


मेरे एक मित्र के लिये ..


मेरे एक मित्र के लिये ..

तुम्हारे रुग्ण शरीर की असहनीय पीड़ा कों
काश ,मै भी कर पाता महसूस
तुम्हारे दर्द कों सहने का सहभागी
मैं नहीं हो सकता
यह सोच  कर मुझे
कुछ नहीं रहा हैं सूझ

अपनी अपनी वेदना कों ..
चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक
स्वयम सहता हैं प्रत्येक मनुज
इसलिए मनुष्य कों
तन्हा कर जाता हैं उसका दुःख

जीवन की इस सच्चाई से अवगत होकर
तुम हो गयी ही अत्यंत भावुक
किसी की मांग सूनी हैं
उस पर भरा नहीं हैं सिंदूर
किसी कों अन्न का एक दाना भी नहीं मिला
लगी हैं उसे जोरो की भूख

दुःख हैं ...
दुःख का निवारण भी हैं ....
ये महावाक्य भी कहाँ  कर पाए हैं
हमें संतुष्ट
सिर्फ सद्भावना के बल पर
नहीं बदल सकते हम
किसी व्यक्ती के वर्तमान जीवन का
दुखद स्वरूप

कष्ट के समय
तिनका तक हाथ छुडा जाता हैं
और दुर्भाग्य के भंवर में
हम जाते हैं गहराई तक ड़ूब
तुम्हारे घर से
मेरा घर यूँ  भी तो बहुत हैं दूर
और रास्ते पर बिछी हैं
अडचनों  की चिलचिलाती हुई धूप
तुम कहती हो
वैसे भी मै किसी का अहसान नहीं लेती हूँ
जबकि तुम्हें तकलीफ  हैं बहुत
इसके बावजूद

निज के स्वतंत्र होने की भावना भी
हम सबमे हैं अदभूत
क्या ..हर बूंद में हैं एक महासमुद्र
इस सत्य कों जानने के लिये
हम सब  में हैं ...
एक जुनून
तुम्हें आत्मसात कर
तुम्हारी रूह से मैं  एकाकार हो चुका हूँ
पर मेरी इसबात का,,,,,
मेरे पास प्रत्यक्ष कहाँ हैं साबूत
किशोर

4 टिप्‍पणियां:

"Nira" ने कहा…

Aap mein khas hunar hai ki aap jab likhte ho aapki kavita chitr ke samaan ho jati jaise koi samne baith ka suna raha ho aap usse mehsoos bhi kar sakte ho.
bahut sandat racha hai, mubarak ho

kishor kumar khorendra ने कहा…

nira ji bahut shukriyaa ..meri kavita me sachchaai hoti hai jo anubhav karta hu turant use likh deta hu ..

prritiy----sneh ने कहा…

bahut sunder bhaavna
shubhkamnayen

kishor kumar khorendra ने कहा…

shukriya priti ji