रविवार, 12 अगस्त 2012

483-मौसम भी हैं खामोश

Kishor Kumar Khorendra द्वारा 11 अगस्त 2012 को 11:33 बजे · पर
पंखुरियों के अंक में हैं
नन्ही नन्ही ओस
भींगा भींगा सा ..
मौसम भी हैं खामोश
खोयी सी लगती हैं  पगडंडियाँ
रास्ते भी पथ भूले भूले से
लगते हैं जैसे वे सब भी
नींद में हो बेहोश
न जाने पर सुनहरी किरणे
किसे रही हैं खोज
सूनेपन की रेत बिछी हैं हर ओर
क़ाला अंधियारा धीरे धीरे छंट गया
धुली धुली सी लग रही हैं भोर
सागर में ..
आती  हुई तरंगे  कर रही हैं शोर
मन करता हैं बढ़कर ..
थाम लूँ लौटती हुई लहरों के
सिंदूरी आंचल का छोर
पंखुरियों के अंक में हैं
नन्ही नन्ही ओस
भींगा भींगा सा ..
मौसम भी हैं खामोश
किशोर

6 टिप्‍पणियां:

expression ने कहा…

वाह..
बहुत सुन्दर!!

अनु

Shanti Garg ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन और प्रभावपूर्ण रचना....
मेरे ब्लॉग

जीवन विचार
पर आपका हार्दिक स्वागत है।

"Nira" ने कहा…

aapne dilke ehsaason ko bahut ache lafazon byaan kiya hain.. ati sundar rachna..

kishor kumar khorendra ने कहा…

expression ji ,anu ji ,nira ji ..bahut shukriya

prritiy----sneh ने कहा…

rachna padhna bhaya, sunder kriti.

shubhkamnayen

कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र ने कहा…

priti ji shukriya