मंगलवार, 26 जून 2012

मैं जैसा था वैसा हीं हूँ

मैं जैसा था वैसा हीं हूँ
ज़रा भी नहीं गया हूँ मैं बदल
तुमसे बिछड़े हुए
व्यतीत हो गये हैं हालाकिं ..
अनेकों बरस ,अनंत पल
परन्तु मेरे ह्रदय में
तुम्हारे प्रति प्रेम उतना ही हैं प्रबल
तुमने अपनी जो तस्वीर दी थी
उसे आज भी तन्हाई में
एकटक निहारते हैं मेरे नयन
वह एक किताब भी हैं
जिसके प्रथम पृष्ट पर तुमने अपना नाम लिख दिया था
मुझे किये बिना कोई संबोधन
मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं हैं ...
मेरे सीने में तुम्हारी याद हैं अटल
वो पेड़ जहाँ तुम मुझसे मिलने आया करती थी
वृक्ष बनकर हो गया हैं सघन
वह सूनी  पगडंडी जिस पर चलती हुई
तुम लौट जाया करती थी
उसके अंतिम मोड़ पर
अब तक नहीं बन पाया हैं
तुम्हारे और मेरे ख़्वाबों का वह महल
लेकिन वह घर जिसमे
तुम रहा करती थी
उसमे कोई नहीं रहता
धराशायी सा -
लगता हैं वह मकान अब खंडहर
पर मुझे लगता हैं ..
तुम  वहाँ   मेरे लिये
खुद कों छोड़ गयी हों
इसलिए वहाँ ...
चला जाया करता हूँ मैं अक्सर
दीवार पर तुमने कुछ लिखा हैं
कोशिश किया करता हूँ
उसे पढ़ने की
पर धूमिल हो चुके हैं उसके अक्षर
शायद तुमने लिखा हैं
प्यार करना आसान हैं
पर प्यार कों निभाना नहीं हैं सरल
लेकिन तुम विश्वास करों ...
मैं जैसा था वैसा ही हूँ
ज़रा भी नहीं गया हूँ मैं  बदल
हो सकता हैं अब मैं तुमसे
कभी न मिल पाँऊ......?
पर अगले जनम में
तुम्हें तलाशने के लिये
अवश्य करूंगा मैं आरम्भ  से पहल
किशोर

2 टिप्‍पणियां:

prritiy----sneh ने कहा…

bhaavpoorna rachna

shubhkamnayen

kishor kumar khorendra ने कहा…

prrity ji shukriya