सोमवार, 31 दिसंबर 2012

न मैं रहता जड़ ..न तुम रहती चेतन ...

566-न मैं रहता जड़ ..न तुम रहती चेतन ...

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 11, 2012 at 5:59pm ·

न मैं रहता जड़ ..न तुम रहती चेतन ...
kishorkumarkhorendra द्वारा 2 दिसंबर, 2009 2:22:00 PM IST पर पोस्टेड #



-तुम गूंजती
मुझमे बनकर धड़कन

तुम निहारती
मुझे बहते निर्झर सा
बन कर दर्पण

तुम्हारी मुस्कराहट -
मेरे अंतर्मन के घने सूने को
छूकर
धूप सी जाती पसर

तुम हँसती तो -
खिले खिले से लगते
चंहूँ ओर के कण कण



-तुम भोर की
मनमोहक सुन्दरता
बुहारती -
मेरे मन आँगन में
अतीत के बिखरे तम
के शुष्क भ्रमित पर्णों को
अपनी किरणों के हाथो
लिए शीतल पवन को संग संग

तुम विराट की असीम चेतना
की
अभिव्यक्ति सी -
मेरे ऊर में ...
रुधिर सी बहती हो निरंतर

मुझे दुलराती
तुम ..
करुणा सी ...

बदले में मै
प्रेम सा -

करता तुम्हारा मधूर स्मरण और चिंतन

अंतर मिट जाता तब
न मै रहता जड़
न ...
तुम रहती चेतन

किशोर

निर्निमेष निहारते है

565-निर्निमेष निहारते है

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 11, 2012 at 5:56pm ·
निर्निमेष निहारते है
kishorkumarkhorendra द्वारा 18 नवंबर, 2009 7:27:00 PM IST पर पोस्टेड #




पेड़ की ओट ..
हो जाता हू
तब भी देख लेता है
मुझे सूर्य का अरुण

मुझे ढूंढ़ लेती है
सिंदूरी किरणे हो ब्याकूल

अज्ञात की उंगलियों सा -
छू लेते है
झुकी हुई टहनियों के
सुकोमल नाखून

अपने आँचल में छिपाकर
संध्या ...
रख आती है
मन्दिर के द्वार मुझे अबूझ

न निगल पाता है मुझे तिमिर
न बुझा पाते है
समीर के बदलते रुख

निर्निमेष निहारते है
मुझे
आकाश के अनंत
चमकते प्रसून

संसार की नीरवता
सुनती है तब ....
मेरी लयबद्ध धडकनों को -
अपने अनुकूल ...

किशोर
 

मुझसे अच्छी है ..मेरी सुंदर कविता

564-मुझसे अच्छी है ..मेरी सुंदर कविता

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 11, 2012 at 5:52pm ·

मुझसे अच्छी है ..मेरी सुंदर कविता

kishorkumarkhorendra द्वारा 7 दिसंबर, 2009 11:31:00 AM IST पर पोस्टेड #


मुझसे अच्छी है

मेरी सुन्दर कविता
तुम जो कहती हो
वही तो .हूँ मै लिखता

मै स्थिर शांत
तट हूँ
तुम बहती
चंचल सरिता


सुनकर ...लहरों के
मन की आपस में
बोली और ठिठोली
पढ़ना और लिखना मै सीखता

मै विस्तृत ..एकांत सा
एक मंदिर
तुम करती हो मेरी शुभ चिंता


लिए भावनावो का अमृत जल
कर जाती हो..
गंगा सी मेरी पवित्र परिक्रमा

प्रात: और संध्या में ..
देखकर तुम्हारी
बहुरंगीय ..अद्वितीय ..गरिमा


मुझ पत्थर की आँखों को भी
अदृश्य का
दृश्य अलौकिक है दिखता

मुझसे अच्छी है
मेरी सुन्दर कविता
तुम जो कहती हो
वही तो ..हूँ मै लिखता

किशोर

कविता के जीवन में

563-कविता के जीवन में

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 11, 2012 at 5:50pm ·

कविता के जीवन में
kishorkumarkhorendra द्वारा 8 दिसंबर, 2009 11:45:00 PM IST पर पोस्टेड #


कविता के जीवन में
मै ..
जब से आया
अनावृत आकाश सा..... हो
मन लौट आया

मौन के कम्पित जल तरंगो सी
तुम्हारी सिरहनों से -
रोमांचित ओस बूंदों में भी
समाये ...
प्रणय के जीवंत क्षणों का
अर्थ समझ पाया

आदिम धडकनों में समाहित
निर्वाण के गान
भूल......
क्षितिज के उस पार .../

प्रकृति के मादक - राग
में
बसंत सा गा फाग

अमराई सा गमक -
प्रेम उन्माद
में

मिटा दुःख की रेखाए
मस्तक से

आनंद के रंग सा घुल
जीवन ताल
में

मनुज ..
माया को कैसे छल पाया
मर्म समझ पाया

कविता के जीवन में
मै ..
जब से आया
अनावृत आकाश ...

सा ...हो

मन लौट आया

*किशोर

मै खूबसूरत फूल हू

562-मै खूबसूरत फूल हू

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 11, 2012 at 5:48pm ·

मै खूबसूरत फूल हू

kishorkumarkhorendra द्वारा 13 दिसंबर, 2009 11:23:00 AM IST पर पोस्टेड #




मै खूबसूरत फूल हूँ
अपनी नर्म उंगलियों से
तुम
मुझे तोड़ लो


तुम अगर
मंडराती तितली हो
तो
मुझ रंगीन पंखुरियों को
छेड़ लो


मै नदी का शीतल जल हूँ
रेत सा -
तुम मुझे ओढ़ लो


नि:शर्त प्रेम की इस
दुनियाँ में
में कहता हूँ तुमसे
नेह का नाता भर
मुझसे
तुम जोड़ लो


मै अंतहीन मधुर स्वप्न हूँ
नींद में भी
मुझे देख लो

जंगल से भी ज्यादा घना
एकांत हू
ध्यान के मौन सा -
मुझमे रह लो

पर्वत की चोटी पर
स्थित
ऊंचा मंदिर हूँ

उगते सूर्य की
निर्दोष किरणों सा -

तुम ...
मुझे अपनी बाँहों में भर लो

तुम यदि अनंत अपरिमित हो

तो

मुझे..

आकाश बन -

सितारों सा जड़ लो

किशोर

लिखते लिखते ...

561-लिखते लिखते ...

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 11, 2012 at 5:46pm ·
लिखते लिखते ...

लिखते लिखते ...
कहानी ..कभी कविता बन जाती है
और
कभी कविता मे ...कहानी आ जाती है

जैसे सपने ...कभी सच हो जाते है
और
कभी सच ...सपने बन जाते है

लेकीन तुम ..
कविता भी हो ...कहानी भी
तुम सच भी हो ..और सपना भी

तुम मेरी कल्पना के करीब हो
इसलीये सच हो

लेकीन न मै तुम्हारा नाम जानता हू
न पता
बहुत दूर आकाश मे
बादलो से है शायद तुम्हारा घर बना


जैसे अजनबी जिन्दगी ने
मुझे समझ रखा है
अपनी ही तरह ...
इस दुनियाँ मे लापता

इसलीये तुम सपना भी हो

कैसे बताऊ कि -
मेरे मन ने ..किसी पौधे से
फूल की तरह ...
तुम्हारी आत्मा के शरीर से
माँगा है -तुम्हारा एक् सुन्दर चेहरा

ममता ,स्नेह ,प्रेम से भरा
अब ....
मेरे पास जीने के लिये
शब्दों के
जालो से भरी -
एक् नदी है
जिसमे मैं तुम्हारे बिना
एक् तड़फती हुई मछली सा
गठानों से हूँ घिरा


किशोर कुमार खोरेंद्र

साल के ऊँचे ऊँचे पेड़

560-साल के ऊँचे ऊँचे पेड़

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 11, 2012 at 5:44pm ·

साल के ऊँचे ऊँचे पेड़
kishorkumarkhorendra द्वारा 15 दिसंबर, 2009 9:43:00 AM IST पर पोस्टेड #


धरती की देह की आँखों के जल ..

की तरह ...मै
पर्वत के मन के शिखर पर
कपास से श्वेत उड़ते हुए
बादल की तरह ......तुम्हे
देखकर सम्मोहित हो गया हूँ

मेरे और तुम्हारे बीच
धूप की हजारो सीढ़ियाँ है
साल के ऊँचे ऊँचे पेड़ है
सागौन की हरी हरी चौड़ी
अनगिनत पत्तियां है

ठहरे से लग रहे -
शालीन जंगल के मध्य
गुजरती हुई अनेक .
खामोश पगडंडिया है

फिर भी -
देह के घर की खिड़की के
उस पार
अन्नंत प्रेम के असीम संसार में -
आकाश से उतर कर धरती में
फैली चांदनी रात की तरह तुम .......
मेरे मन के
ब्याकुल समुद्र में
स्नेहमयी शीतल किरणों की तरह
घुल जाना चाहती हो

और मेरे पास ......
तुम्हारे दिव्य -प्रेम के समक्ष
नत -मस्तक होने के अलावा
कोई रास्ता भी तो नही है

किशोर

उड़ने लगता है कमरा

559-उड़ने लगता है कमरा

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 11, 2012 at 5:41pm ·

उड़ने लगता है कमरा


चिड़िया के आते ही
उड़ने लगता है कमरा
खिड़किया फडफडाने लगती है
कोने दुबकने लगते है ...

कभी सोफे पर
कभी आईने के सामने बैठ जाती है चिड़िया

घर में अपने लिए
एक घोसला ढूंढ़ती है
तिनको की तरह
बिखरे हुए सपनों के टुकड़ों से -
भर जाता है -कमरा

मुझे उन दिनों
तब -
दफ्तर में काम करते समय

एकाएक ....
याद आती है
वह उड़ती हुई नन्ही चिड़िया

शेविंग क्रीम से पुते मेरे चेहेरे को
गौर से देखती हुई
वह नन्ही ..निडर गौरया...

उसकी गोल नन्ही आँखें मुझसे
शायद पूछती है -

आप मेरे अंडों ..फिर बच्चों का
खयाल रखेंगे ...

तब में याद करता हूँ ..
पंखे के स्विच को मैंने आफ ...
किया है या नहीं .....

किशोर

मुझसे आकर मिल

558-मुझसे आकर मिल

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 11, 2012 at 5:39pm ·

मुझसे आकर मिल
kishorkumarkhorendra द्वारा 21 दिसंबर, 2009 9:36:00 PM IST पर पोस्टेड #


चाहता हूँ में

सारी किताबें पढ़ लूँ
या
घर आकर मुझे ...
सारी किताबें पढ़ ले

हो सकता है .....

पत्थरों से निर्मित
भव्य मन्दिर की छत की
सभी स्वर्ण ईंटें
आपस में सहमत हो

या

विशाल वृक्ष की
अनपढ़ डालियों पर
झूमती
पत्तियों की हथेलियों की
रंजिश करती ऊंगलिया
आपस में असहमत हो

या
नियमों के अटल पहाड़ हो
या

पुलों के अनुशासित विचार हो

या फिर -
मील के पत्थरों को
तन्हा छोड़ आए
चौड़ी सड़कों के ...लंबे सुखों को
आत्मसात कर लौटे
ट्रकों के पहियों सा
घिसा -पीटा वर्तमान हो

सब चलेगा .....
..डरी सहमी या सजी सन्वरी
जिंदगी से
समझौता कर
में जी लूँगा

इस सुंदर प्रकृति
और
तुमसे मिलें प्यार की खातिर

दर्द से भरे मेलों के जग में
रेत की नदियों को निचोड़ कर
मैं ..पानी पी लूँगा

लेकिन ऐ जिंदगी ...
बस यही एक शर्त है ...
हर चौराहे ,हर मोड़ पर -मुझे संग रखना

दुखों के पहाड़ हो
या
सुखों की मीठी -नमकीन झील
यात्रा के अंत तक
मुझे रखना
अपने साथ शामील

वर्ना
मेरी शर्तों पर ...
जीने के लिए

जिंदगी ....!
तू ....
मुझसे आकर मिल /


किशोर

सदियों पहले जब शब्द नही थे

557-सदियों पहले जब शब्द नही थे

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 11, 2012 at 5:37pm ·
सदियों पहले जब शब्द नही थे
kishorkumarkhorendra द्वारा 24 दिसंबर, 2009 12:13:00 PM IST पर पोस्टेड #


मुझे ठीक से देखो ..
मै कमीज नही हू
न ही कोई भाषा हू
न ही कोई बोली

सदियों पहले जब शब्द नही थे

तबभी -
मै और तुम थे

तब भी दूर से -
तुम मुझे सुन लिया करती थी
और मै आज की ही तरह
उन दिनों भी तुम्हें ...सोच लिया करता था

उस समय भी ..यही आकाश था
जिसके बादल ...
हमें नदी मे तैरते हुए देखा करते थे

नदी के उस पार से तुम मुझे
और इस पार से मै ..तुम्हें
बिना पुकारे ही ..पुकार लिया करते थे

न तुम्हारा कोई नाम था
न ही मेरा कोई नाम
न तुम्हें पता था कि ...मै कौन हूँ
न मुझे मालूम था कि -तुम कौन हो
लेकीन
अनपढ़ प्यार कों ज्ञात था कि -
की मै और तुम
न शब्द है न भाषा है ...और

न ही हैं ब्याकरण

तुम जल में मुझ रंग के पास हैं

घुल जाने का आचरण

तुम पत्ती हो तो

मैं हूँ उसका हरापन

किशोर

क्या कहूँ ..तुमने तो सब कह दिया

556-क्या कहूँ ..तुमने तो सब कह दिया

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 11, 2012 at 5:34pm ·
क्या कहूँ ..तुमने तो सब कह दिया
kishorkumarkhorendra द्वारा 3 दिसंबर, 2009 9:42:00 AM IST पर पोस्टेड #


समुद्र ने मुझे
रोकना चाहा

लहरों के हाथ मुझे
बुलाते रहे

उसकी पुकार को मेरा
लौटता हुआ मन
सुनता रहा

पर्वत के छत पर
टहलते बादलो ने
मुझे घेर लिया

प्रपात के धारो की छलांग
से उत्पन्न नाद से
खुश घाटियों ने
धुंए की तरह
मुझे जकड़ना चाहा

मुझे ठहरने के लिए
आग्रह करते
पुष्पों की महक को -
मेरा लौटता हुआ मन
अस्वीकार करता रहा

जंगल के एकांत के
शीतल शांत
संगमरमर के पत्थरो से
बनी सीढियों से उतरता हुआ
मै लौट रहा हूँ

हे कल्पना तुम तक ....
तुम्हारी करुणा के
उदार महासागर तक ...

तुम्हारे प्रेम की
अन्नत ऊँचाईयों तक ...

शायद मेरी कल्पना
मुझसे अब कहेगी -

क्या कहूँ ..
तुमने तो सब कह दिया

किशोर

काँच का मनुष्य

554-काँच का मनुष्य

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 11, 2012 at 5:30pm ·



kishorkumarkhorendra द्वारा 27 दिसंबर, 2009 11:10:00 AM IST पर पोस्टेड #

तुम मुझे
अपने आंसुओं के पवित्र जल से रोज नहलाती हो
तुम मुझे
हिरदय के अपने स्व्क्छ रूमाल से
साफ़ करती हो

मेरे लिए यही
प्राथना करती हो
हे प्रभू
इसे टूटने मत देना

फिर दुनिया के स्वागत कक्ष मे रख देती हो

यह कहते हुए
कि
जब लोग आये
तब
अपने दिल के आईने मे
रखी मेरी तस्वीर मत दिखा देना

मुझसे अनजान बने रहना
मुझे देखना मत
मेरे करीब मत आना
मेरा नाम मत पुकारना

लेकीन मै तो
आर -पार दिखाई देने वाला
कांच का मनुष्य हूँ

उसके आंसू
मेरी आँखों की दुनियाँ मे सुरक्षित है
उसके स्पर्श के हाथो की कोमलता
मुझसे
देह की तरह चिपकी हुई है

उसकी शाश्वत कामना है -
मै साबूत रहूँ

और वह
मेरे पारदर्शी शीशे की
अटूट आत्मा के दर्पण मे
अपनी विभिन्न परछाईयों कों
निहारती रहें -मुक्त और स्वतंत्र समझ

पर मै
नाजूक कांच का मनुष्य
उसके प्यार और सौन्दर्य की
आंच से
कभी भी
टूट कर बिखर सकता हू

और स्वागत कक्ष मे
उपस्थित निगाहों कों ...
अपने प्रेम से घायल
व्यक्तित्व के प्रखर टुकडो से -
चूभ सकता हूँ

किशोर

मुझ तट के लिए

553-मुझ तट के लिए

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 11, 2012 at 5:29pm ·
मुझ तट के लिए
kishorkumarkhorendra द्वारा 25 दिसंबर, 2009 1:37:00 PM IST पर पोस्टेड #

दर्द के समुद्र की
गर्जनाओं से बने
मौन की तरह ..
तुम चुप हो

रेत के टीलों से बने शहरों से
निर्मित ...

एक् चट्टान से सहारा लेकर
विश्राम करती हुई
मेरी रीढ़ की नसों मे
तुम ...
स्मरण की प्रवाहित
झंकृत धुन हो

युगों के विरह की
अग्नि मे तपकर
एकत्रित ईटो से बना
मेरे पदार्पण के इंतज़ार मे
अकेले खड़े .. तुम
एकांत का सुदृढ़ पुल हो

शिखर पर जमी बर्फ सा
न तुम पिघलते हो
न बहकर मेरे करीब से गुजरते हो
जल रहित अदृश्य से हो तुम
लेकीन
मुझ तट के लिए
बहती हुई नदी होने के

अहसास से परिपूर्ण हो
किशोर

तुम आकाश हो

551-तुम आकाश हो

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Sunday, November 11, 2012 at 5:25pm ·


मै सिमित धरती

तुम उड़ते हुए उन्मुक्त बादल हो
मै एक लकीर पर बहती नदी


तुम मधुर स्वप्न हो
मै मन की शुभ अंतरदृष्टी

तुम बान्हे फैलाए तट हो
मै मंझदार मे
डगमगाती सी चिंतित खड़ी

तुम क्षितिज सा अप्राप्य हो
मै तुम्हें छूने के लिये
जिद्द पर हू अड़ी

तुमसे मिलन असंभव हो
मै विरह की जीती हूँ
अमिट जिन्दगी

तुम उदयाचल का सूर्योदय
मै अस्ताचल मे
अंतिम तम बन ठहरी

तुम ...निराकार
अनश्वर सम्पूर्ण सत्य हो
मै ...साकार
देह बनी अधूरी

तुम महानगर मे सचमुच
गौरव पथ हो
वहां से मेरे इस
अबूझ गाँव तक के पथ की
मै हू ...अनंत दूरी

किशोर
 

सुरक्षित रहे यह दुनियां

550-सुरक्षित रहे यह दुनियां

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Thursday, November 1, 2012 at 6:00pm ·

सुरक्षित रहे यह दुनियां


पगडंडियाँ जहाँ पर थक-कर
आकर ठहरती है
शुरू होती हैं

वहीं से मेरी कविता
मै एक वृक्ष की छाँव सा
पगडंडियों से पूछता हूँ
उनका दर्द
हर मोड़ के प्रति
उनका आकर्षण
उनकी धूल को किस -किस ने
माथे पर
लगा कर किया था यात्रा का शुभारम्भ
कौन चल नही पाया
क्या किसी की कामना पूरी हो गई ?
करने के पश्चात मन्दिर का दर्शन
लोगो के दुखों से द्रवित होकर
कईयों का हो गया होगा
हिरदय परिवर्तन
जब पगडंडिया
लौटती है
उस पार पहाड़ के उतरती है
मेरी पत्तियाँ टूट -टूट कर दौड़ती हुई
उनका पीछा करती है
बदले मे लौट कर आए पंछियों से
भर जाता हूँ मै
और देखता रह जाता हू
तिनको का जमाव
घोसलों से अंडो का लगाव
कई बार मुझे लगने लगता है
चिडियों की जगह मै बैठा हूँ
अंडो की देखभाल करते हुए
लेकिन
मुझसे टूट कर गिरे एक पत्ते की तरह
कभी न कभी कोई एक
नया बच्चा
घोसले से बाहर गिर ही जाता है .... मानो
मेरी हथेली से मै ही फिसल गया होऊ .....
तब
ऐसा लगता है मुझे ...मुझसे कोई अपराध हो गया हो
पता नही घोसले को पछतावा हुआ या नहीं
मगर चिडियों की तरह
मेरी भी चीख निकल जाती है एकाएक
मै कर रहा हूँ आत्म समर्पण ......
क्योकि मेरा ,हर मनुष्य का -
यह दायित्व है
की
सुरक्षित रहे यह दुनियां

किशोर कुमार खोरेन्द्र

मै तुम्हारा मन हूँ "

549-"मै तुम्हारा मन हूँ "

by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Wednesday, October 31, 2012 at 12:41pm ·

"मै तुम्हारा मन हूँ "

मै तुम्हारा मन हूँ
अनेक शब्दों के बादलो से बनाता हूँ
तुम्हारा चित्र
या
अनेक चित्रों के अक्षरों से ,रचता हूँ
तुम्हारे लिए शब्द
तुम कभी बादलो को बाहों मे भर लेती हो
या

तुम कभी मुझे एक शब्द की तरह
पुकार लेती हो
तुम्हारी पुकार के प्रतिउत्तर में
तुम तक पहुँचने की कोशिश में
शुष्क पत्तियों की तरह में बिखर जाता हूँ
सपनो से
लाख मांगने पर भी
एक भी स्वप्न अपने दायरे से बाहर
निकल कर जागरण के लिए
तुम्हे
स्वप्न का एक टुकडा नहीं लौटाता
और इस तरह
तुम्हारे पास
या
तो -बिना आकृतियों वाले शब्द रह जाते हैं
या
फ़िर -बिना शब्दों की
एक धूमिल सी आकृति रह जाती है
लेकिन क्या हम एक दूसरे के लिए
केवल शब्द है
या
शब्दों से परे धुंध से बने चित्र हैं....?

किशोर कुमार खोरेन्द्र

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

544--नदी हूँ



544--नदी हूँ
by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Monday, October 29, 2012 at 5:56pm ·



नदी हूँ
मै ...मौन

तटस्थ मन्दिर की सूनी सीढ़ियों  का
झिलमिलाता दृश्य लिए
 या
 पीपल की घनी बाहों से
झरे
पत्तो की शुष्क अधरों की प्यास लिए

मै बहती हूँ
खुद राह बनाती
तोड़ धरती की पथरीली छाती
मोड़ से हर
आगे बढ़कर
लौट कर
फिर कभी नही आती

नदी हूँ
मै ...मौन

गहराई से मेरा नाता है
सत्य की सतह का स्पर्श
जो नही कर पाता है
उसे इस
जग -जल मे
तैरना कहाँ सचमुच आता है

पारदर्शी देह के कांच में अपने
मौसम के हर परिवर्तन का
अक्श लिये

सोचती हूँ ..
कभी थाम कर
सदैव रहूँ
बादलो के जल -मग्न छोर

धरा के जीवित पाषाणों की
लुभावनी आकृतियों के आकर्षण कों
छोड़

या

वन वृक्षो की जड़ो का
मेरे लिए
मोह का दृड़ नाता तोड़ 

मै चाहती बहती रहूँ  निरंतर
क्षण क्षण
कल कल की धुन की मधुरता
अपने एकांत के वृहत रेगिस्तान मे घोल 

समय की नदी हूँ
एक ..मै मौन अनमोल 
 किशोर कुमार 

543-do kavitaaye




543-do kavitaaye
by Kavi Kishor Kumar Khorendra on Monday, October 29, 2012 at 5:52pm ·
 

1-
तेरी आँखों के नूर से
पूनम है पसरा

तेरे अधरों के रंग से
जल मे कमल है उभरा

तेरे तन की खुश्बू से
उपवन है महका

 तेरे मन के पृष्ठ पर
तेरी रूह ने
लिखी है एक गजल उमदा

तेरे मुखडे सा
चाँद है उजला


2-
तेरे प्यार के सागर की
चंचल लहरे
करती है ..मस्ती
तैर रही उस पर
मेरे जीवन की
हिचकोले खाती  कश्ती

तेरी चाहत के अधर 
मंझधार के सूने मे
मुझसे कुछ हैं कहती

झिलमिलाते किरणों सी
फ़ीर तुम्हारी धूप सी
मुस्कुराहटे है हँसती 

तेरी निगाहों के इस
खुबसूरत झील मे
मुझ डगमगाती नैया की
अब क्या है हस्ती

किशोर कुमार