शनिवार, 17 जुलाई 2010

मुझे नहीं हैं पसंद

अखबार की तरह
मुझे सभी लेते हैं पढ़

लेकिन तुम हो एक
सजिल्द किताब सी बंद

मेरे विषय में तो
हर किसी कों हैं खबर

लेकिन तुम बर्फ से ढकी
हुई हो -शिखर पर ....
मन्दिर की -एक स्वर्ण कलश

इसलिए
तुम्हारी प्रतिभाओं से हो कर
अनभिग्य -
मैंने भी अपनी कल्पना में
तुम्हारे बारे में -अनेकों kahaniyaan
ली हैं गढ़

मैं हर चबूतरे या चौराहे पर
लोगों से जात्ता हूँ मिल
सुनता हूँ -सब का दुःख
इसी लिये -तुम्हारे संग संग
पाया नहीं अब तक चल

तुम कहती हों मुझसे -
मुझे चलते रहना हैं संभल
अपनी देह की गगरी तक ही
रहती हूँ मैं -छलक

पर मैं कहता हूँ -
ठीक हैं हर कोई
अपनी देह की कमीज कों
पहन कर -
भीड़ के समुद्र की लहरों सा
अपनी अपनी राह में
रहा हैं मचल

लेकिन ..सामाजिक जीवन
पर्वत तो नही हैं .....जड़
की उसकी समस्याओं के दुर्ग
पर विजय की पताका फहराए
हर कोई अलग अलग

इसलिए
लोगों से मिलने से पूर्व
अपने चेहेरे पर -
और एक चेहरा लेती हो कयों मद
तुम्हारी यह aadat
मुझे नहीं हैं पसंद

किशोर

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