शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

सौन्दर्य का सृजन



जल कहता हैं

मुझे मत छूना

सिहर कर मैं जाउंगा हिल

परछाई कहती

मत करना मेरा स्पर्श

भावावेश में हो उत्तेजित

मैं जाउंगी मिट

लगता हैं मैं हूँ मानों -

मनुज ..एक सीप

जो अपने सीने में -

पंखुरियों के सदृश्य

ह्रदय की भावनाओं से निर्मित

कल्पनाओं के रंगीन मोती कों -छिपाए हुए

रह जाता हैं -आखिर तक गरीब



मेरी कल्पना तुम नहीं हो कमीज

की -

जिसे मैं उतार कर

खूंटी पर टांग कर -कर जाऊ विस्मृत



तुमने तो मेरे -तन ,मन ,और आत्मा तक कों

रंगीन चूनरी सा ओढ़ रखा हैं

हे मेरी कल्पनातीत

इसलिए चाहता हूँ मैं -

कभी तुम जाओ मुझे

इस स्वप्न रूपी जग में

साकार रूप में मिल



लेकिन तुम कहती हों -मुझसे ...

मैं आईने के भीतर हूँ समाहित

मुझे बिम्ब समझो या ...

प्रतिबिम्ब

मतलब एक ही हैं -

ध्यान -मग्न यदी ..विचारोगे

होकर तल्लीन

मेरी सुन्दरता हैं ...

अनुपम और रमणीक

जिस दर्पण में मैं हुई हूँ -परावर्तीत

वह दर्पण भी हैं

असीम और अपरमीत



इसलिए हे कवि -

मैं कल्पना हूँ

चिर यौवना और शून्य में --कोहेरे सी विलीन

मैं स्वप्ना सी तुम्हें होते रहती हूँ

जागरण हो या नींद -

दोनों ही अवस्थाओं में आभासित

इसलिए मुझे यदी चाहोगे

अपने बाहूपाश में यदि भीचना

तो

चूर चूर हो जायेंगा संग

उसी क्षण -

दर्पण का भी अस्तित्व

फिर कैसे रचोगे

कल्पना में ...सौन्दर्य के उतुंग शिखर कों

हे कवि .......!

सृजनशील



kishor
copy on 14-08-13