सोमवार, 17 मई 2010

समर्थन अनुकूल



शहर के बीच


थी बहुत भीड़


लेकिन किसी व्यक्ति से


नही हो पायी मेरी बातचीत


अब मैं


बहुत दूर ...


नदी के साथ साथ चल रहा हूँ


लेकिन मेरे मन में भी हैं


एक गहरा समुद्र



जिसके लहरों के प्रश्नों के घाट -प्रतिघात से


निरुत्तर तट अब तक हैं अटूट


शहर हो ,जंगल हो , या ग्राम


हर जगह वृक्ष ,पर्वत


और जल ...सब हैं चुप


केवल जीविका उपार्जन के


लिये ही


बनता हैं सामाजिक -मनुष्य


शेष समय वह होता हैं


अकेला और मूक


लेकिन अंतत:


संसार के रेगिस्तान से छनकर


उड़ रहा बालू कण सा हैं महीन


मेरा रूप


या


मौन के जल का निथरा हुआ


हूँ एक बूंद


raajniti और आर्थिक निति


के अंतर्गत हैं मानव समूह


लेकिन


व्यक्तिगत परिप्रेक्ष्य में अपनी


निजता के अवबोध से हैं


हर मनुज व्याकुल


क्या ज्ञान के लिये जरुरी हैं


की


मैं जान लू व्यापक सिन्धु सम्पूर्ण


या


खंगालू अपने भीतर के


व्यक्तित्व में अकेले ही


आनंद का स्वरूप


लेकिन


इस उपलब्धि के लिये


आवाश्यक हैं


स्त्री मन और पुरुष मन में


परस्पर ..सौहाद्र पूर्ण ...


समर्थन अनुकूल



किशोर




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