रविवार, 2 मई 2010

प्रतिबिम्बों का झूठा समर्थन

दर्पण के मन के ॥कांच का हूँ मैं
एक अक्स
उस चेहेरे सा ही मेरा चेहेरा हैं
क्या सच ...?
कांच के भीतर परछाईयों से मुलाक़ात होती हैं
अकसर
और रिश्तों में गहराई का मुझे होता हैं
भरम
तोड़कर शीशे की दीवार बाहर नही पाता
उतर
खुद कों पहचानने के लिये जब भी खड़े होता हूँ
सबके समक्ष
निगाहों के शीशे मुंह फेर लेते हैं
उधर
हरेक के पास अपनी हैं
एक चमक
मुझे कौन पहचानेगा मैं तो हूँ अंधेरो से बना
एक तमस
लेकिन उन्हें पता नहीं काली पृष्ट -भूमी पर ही उभर कर आते हैं
श्वेत ॥दुधिया ..धवल रंग
लेकिन मेरे लापता इस व्यक्तित्व कों कैसे समझाऊ कि
सत्य कों जीने के लिये नही चाहिए
दर्पण में समाये
प्रतिरूपों कों अपनाए
प्रतिबिम्बों का -झूठा समर्थन
किशोर

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