रविवार, 11 अप्रैल 2010

सात चित आनंद से परिपूर्ण

मैं लिखता हूँ कविता

और

तुम हो पढ़ती

दो आत्माओं के मध्य

हो रही केवल बातें हैं

सुन्दर और अच्छी

पहले पढ़ते थे लोग किताब

अकेले चुपचाप

अब मैं सुना रहा तुम्हें

स्वयं रच काव्य

मानो हो तुम श्रोता

सम्मुख मेरे -

आजकल कविता ..कवि से

यही शुभ काम करने के लिये तो हैं कहती

तुम भी प्रक्रति का ही हो अंग

fuul saa सुन्दर और

sukumaar तुम्हारी भी

चेतना का हैं रंग

तुम्हें मां एक आदर्श

मैं कर रहा अगर सृजन

तो इसमे क्या हैं हर्ज

मित्र यह हैं

सत चित्त आनंद से परिपूर्ण

एक सहज कर्म

किशोर

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