गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

आते एक संग हर्ष और विषाद



आते एक संग हर्ष और विषाद


उठते मन में राग और विराग


जैसे


काँटों कों देखो तो


दिखाई नहीं देते जीवन में


खिले अनेक गुलाब


आनंद में यदि व्यतीत हो काल


तो लगता क्षण भर के सपनों सा


हैं यह संसार


पर यदि अमावश आ जाए


तो लगता कितने लम्बी हैं


जीने कों उपलब्ध यह रात


पाने कों पद ,प्रतिष्ठा और ...


बनाए रखने अपनी साख


हम सब करते संघर्ष आजीवन


जिजीविषा कि यह ज्वाला भीषण


लेकिन


अनुराग की भूमिगत धारा एक


सतत बहती मन की जमीन के भीतर


मनुष्य उस प्यार या भक्ति कों


जानकर भी नहीं कर पाता अभिव्यक्त


हलाकि -


उस अनुराग का स्पर्श होता हैं


चन्दन के लेप सा शीतल


प्रेम एक भाव हैं जो रहता स्वयं तक सिमित


लेकिन प्रभाव से उसके


आकार हो


हो या निराकार


दोनों ही हो जाते आकर्षित


प्रेम कि अनुभूति कर चित्त कों


रहना हैं आनंदित


लेकिन -


भाग -दौड़ ..और प्रतिस्पर्धा


से घिरे मनुष्य कों


पल पल ....कर जाता दुखित


किशोर






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