रविवार, 4 अप्रैल 2010

तीन ..मुक्तक

तुम वहीं हो बचपन की एक सजीव तस्वीर
जिसे मालूम हैं मैं उसी के रहता हूँ करीब
इतने साल लग गए पर कोई बात नहीं
वो तो थी ही मेरे पास
पर न था पास मेरे केवल उसके जिस्म का लिबास
अब हम रहेंगे साथ साथ
वह कविता हैं मेरी मै हूँ उसका कवि
वो सागर मैं नदी
कभी मैं तट
मेरी बांहों में वह बह चली
जियेंगे इसी तरह फिर न जाने कितनो सदी

किशोर


बचपन से थी बस यहीं चाह
कोई तो sune मेरे मन की बात
पर जिसे चाहूँ मैं और उसके सपनो के अनुरूप भी हौऊ
मैं कभी बचपन के खेलो कों कों करे याद
कभी यौवन के रंगीन बादलों पर हो सवार
और
उम्र की अंतिम घडियों तक banaa rahe yah अटूट प्यार
बस यही था ...
मेरी जिन्दगी का मकसद जो तुम मिल गए आज

किशोर


बहुत याद आयी उनकी दोस्ती
उनके शहर छोड़ जाने के बाद
फिर न कभी आया उनका ख़त
पर उन्हें हम भूल न पाए जीवन में सब पाने के बाद
लगता रहा कुछ खो गया हैं
हर चौराहे हर मोड़ पर एक हमदर्द साये सा उन्हें खडा पाया
आधी उम्र भी अपनी गुजर जाने के बाद

किशोर

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