मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

तुम मुझे सुन रही हो


क्या इस वक्त तुम मुझे सुन रहीं हो


या

मैं तुम्हें दीवार सा घूर रहा हूँ


क्या इस समय तुम मुझे पढ़ रहीं हों

या


मैं तुम्हें खिड़की के उस पार से निहार रहा हूँ


क्या तुम इस बार मन ही मन मेरा एक चित्र बना रहीं हो

या

मैं तुम्हारे समक्ष धूप की हथेली पर फूलों का रंग लिये खडा हूँ

क्या

तुम मुझसे कुछ कहना चाह रहीं हो

या

मैं तुम्हारे उस मौन कों लिख रहा हूँ


हम दोनों समान -अर्थी एक हीं शब्द हैं


तुम अगर समुद्र हो तो मैं उसमे भरा जल हूँ


तुम अगर अदृश्य हो तो मैं उसे साकार करने में रत मन हूँ


तुम अगर दृश्य हो तो मैं उसके सौन्दर्य कों आत्मसात करने के लिये बना दर्पण हूँ


किशोर

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