रविवार, 4 अप्रैल 2010

मुझे दिन काटते रहें


मुझे दिन काटते रहें

रातो के बिस्तर काँटों से चुभते रहें

नींद मुझसे कोसों दूर रही

दर्द के उजालो में मै अपनी ही किताब पढ़ता रहा

किसी की याद में भीतर ही भीतर दुःख की नदी में बहता रहा

फिर भी शेष रहा ....यह सोच कर कि -कभी तो किनारों के हाथ मुझे खीच लेंगे

और फिर...मेरे साथ सपने होंगे

साँझ और सुबह के सुनहरे पल होंगे

लहरों के पांवो के पायल में बजते हुवे नुपुर के मधूर स्वर होंगे

लेकिन इसे पाने के लिये मुझे रोते हुवे कोई न देखे

इसलीये मैं ज्यादा हँसने लगा

चेहेरे पर नया आवरण मढ़ने लगा

पर उसे मेरी वेदना का अहसास -हैं या नहीं

मुझे ज्ञात नहीं ...मेरे ओंठ कहते हैंहमने तो कह दिया हैं

तुम ही हो जिसकी हम पूजा करते हैं

अब सब्र करो

शांत रहो

विरह की इस पीड़ा कों सहो .......

किशोर

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