रविवार, 11 अप्रैल 2010

सोच रहा हूँ

पहाड़ की छत पर
तुम्हें याद करते हुए बैठे
सोच रहा हूँ

वह तुम्हारी मुझे निहारती आँखे हैं
या
कांच की कटोरी में
भरी हुई एक झील

वह चाँद हैं या चेहेरा
मुझे
डूबे हुवे बर्फ के एक टुकड़े सा
लग रहा हैं
मेरा ही प्रतिबिम्ब

पत्तीयों और बहती हवा के साथ
मैं भी तुम्हें याद कर
गुनगुना रहा हूँ एक गीत

जड़ो में नमी हैं
जड़ों की उंगलियाँ
जल से गयी हैं भींग

कुछ पीले पत्तों की
शरारती हथेकियों के छूटे ही
जल के दर्पण में
मेरा या चाँद का चेहरा
गया हैं हिल

मैं अब उतर रहा हूँ
सीढियां ...लेकिन

यह जाने बिना की
एकांत के मन का
कुछ पल के लिये ही सही
tuutaa हैं तन्मय दिल

मोंगरे की खिली पंखुरियों के सदृश्य
श्वेत रंग में लीन
शिखर पर -
एकाग्रचित हैं स्थित
वह शांत स्थिर
सौम्य मौन मन्दिर

किशोर




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