मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

हमारे चेहेरों की परछाईयाँ


तुम्हारे चेहेरे का प्रतिबिम्ब


सपनों की नदी में बहते हुवे मेरे सपनों के तट तक पहुंचता हैं


उस चेहेरे कों मैं अपनी हथेली में रख कर गौर से निहारता हूँ


बिंदियां में रंग सा खुद कों भरा पाता हूँ


सीप जैसे ...सुन्दर नयनों के भीतर स्वयं की तस्वीर कों जड़ा हुआ पाता हूँ


मुझे इतने समीप पाकर सपने में भी वह मुस्कुराने लगती हैं


और


उसके अधरों की दो पंखुरियां खिल जाती हैं


रेशम के धागों के सदृश्य उसके अलकों के महीन जाल में अपने ध्यान कों उलझा हुआ पाता हूँ


उस्के गालो का स्पर्श पाते ही मेरी उंगलियाँ फिसल सी जाती हैं


हम दोनों महसूस करते हैं


कि -


हमारे चेहेरों की परछाईयाँ इसी तरह रोज रात कों


एक दुसरे की हथेलियों पर सर रख कर सोती हैं


किशोर

2 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

kishor kumar khorendra ने कहा…

shukriyaa ..

sanjay jii