शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

वह खामोश थी


वह खामोश थी

हालांकि -उसे मालूम था सामने बैठा हुवा शख्स उससे बहुत प्रभावित हैं

वह उसके चित्र बनाता हैं और उसके हर भाव पर काव्य रचता हैं

बहुत देर बाद उसने मुझसे कहा -

हमसे बड़ी हमारी कवितायें हैं हमारी पेंटिंग्स हैं

मैंने महसूस किया कि -वह ठीक कह रही हैं

इस शांत और संयमित मुलाक़ात के बाद

मैं उसे अभिवादन कर बाहर आ गया

मुझे अब धूप में चमक कम लग रही थी

सूरज नदी से बहुत ऊँचाई पर था

फिर भी गमलो में खिले फूलों के रंग कुछ फीके लग रहें थे

ऐसे ॥ वह पास ही खडी थी मुझे आज के अंतिम नमस्कार के लिये

तभी मुझे याद आया ......

मैं उससे उसकी कविता नहीं सुन पाया हूँ

न ही वह लोरी जिसे मैं मन ही मन रोज रात सोने से पहले सुनता हूँ

और न ही मैं उसके आँचल के छोर से पानी से तर अपने ओंठो कों पोंछ पाया हूँ


शायद इस जन्म में मिला -उसके प्रेम के स्पर्श का एक शुभ अवसर ....

मेरे हाथ से फिसल चुका था

मैंने देखा फर्श पर बिखरे कांच के काल्पनिक टुकडो में हमारी आत्माए

हमारे इस संकोच पर एक साथ खडी हुवी मुस्कुरा रही थी


किशोर

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