गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

शुधु केवल सुरे बाजे


आते एक संग हर्ष और विषाद



आते एक संग हर्ष और विषाद


उठते मन में राग और विराग


जैसे


काँटों कों देखो तो


दिखाई नहीं देते जीवन में


खिले अनेक गुलाब


आनंद में यदि व्यतीत हो काल


तो लगता क्षण भर के सपनों सा


हैं यह संसार


पर यदि अमावश आ जाए


तो लगता कितने लम्बी हैं


जीने कों उपलब्ध यह रात


पाने कों पद ,प्रतिष्ठा और ...


बनाए रखने अपनी साख


हम सब करते संघर्ष आजीवन


जिजीविषा कि यह ज्वाला भीषण


लेकिन


अनुराग की भूमिगत धारा एक


सतत बहती मन की जमीन के भीतर


मनुष्य उस प्यार या भक्ति कों


जानकर भी नहीं कर पाता अभिव्यक्त


हलाकि -


उस अनुराग का स्पर्श होता हैं


चन्दन के लेप सा शीतल


प्रेम एक भाव हैं जो रहता स्वयं तक सिमित


लेकिन प्रभाव से उसके


आकार हो


हो या निराकार


दोनों ही हो जाते आकर्षित


प्रेम कि अनुभूति कर चित्त कों


रहना हैं आनंदित


लेकिन -


भाग -दौड़ ..और प्रतिस्पर्धा


से घिरे मनुष्य कों


पल पल ....कर जाता दुखित


किशोर






मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

तुम मुझे सुन रही हो


क्या इस वक्त तुम मुझे सुन रहीं हो


या

मैं तुम्हें दीवार सा घूर रहा हूँ


क्या इस समय तुम मुझे पढ़ रहीं हों

या


मैं तुम्हें खिड़की के उस पार से निहार रहा हूँ


क्या तुम इस बार मन ही मन मेरा एक चित्र बना रहीं हो

या

मैं तुम्हारे समक्ष धूप की हथेली पर फूलों का रंग लिये खडा हूँ

क्या

तुम मुझसे कुछ कहना चाह रहीं हो

या

मैं तुम्हारे उस मौन कों लिख रहा हूँ


हम दोनों समान -अर्थी एक हीं शब्द हैं


तुम अगर समुद्र हो तो मैं उसमे भरा जल हूँ


तुम अगर अदृश्य हो तो मैं उसे साकार करने में रत मन हूँ


तुम अगर दृश्य हो तो मैं उसके सौन्दर्य कों आत्मसात करने के लिये बना दर्पण हूँ


किशोर

रविवार, 11 अप्रैल 2010

सात चित आनंद से परिपूर्ण

मैं लिखता हूँ कविता

और

तुम हो पढ़ती

दो आत्माओं के मध्य

हो रही केवल बातें हैं

सुन्दर और अच्छी

पहले पढ़ते थे लोग किताब

अकेले चुपचाप

अब मैं सुना रहा तुम्हें

स्वयं रच काव्य

मानो हो तुम श्रोता

सम्मुख मेरे -

आजकल कविता ..कवि से

यही शुभ काम करने के लिये तो हैं कहती

तुम भी प्रक्रति का ही हो अंग

fuul saa सुन्दर और

sukumaar तुम्हारी भी

चेतना का हैं रंग

तुम्हें मां एक आदर्श

मैं कर रहा अगर सृजन

तो इसमे क्या हैं हर्ज

मित्र यह हैं

सत चित्त आनंद से परिपूर्ण

एक सहज कर्म

किशोर

सोच रहा हूँ

पहाड़ की छत पर
तुम्हें याद करते हुए बैठे
सोच रहा हूँ

वह तुम्हारी मुझे निहारती आँखे हैं
या
कांच की कटोरी में
भरी हुई एक झील

वह चाँद हैं या चेहेरा
मुझे
डूबे हुवे बर्फ के एक टुकड़े सा
लग रहा हैं
मेरा ही प्रतिबिम्ब

पत्तीयों और बहती हवा के साथ
मैं भी तुम्हें याद कर
गुनगुना रहा हूँ एक गीत

जड़ो में नमी हैं
जड़ों की उंगलियाँ
जल से गयी हैं भींग

कुछ पीले पत्तों की
शरारती हथेकियों के छूटे ही
जल के दर्पण में
मेरा या चाँद का चेहरा
गया हैं हिल

मैं अब उतर रहा हूँ
सीढियां ...लेकिन

यह जाने बिना की
एकांत के मन का
कुछ पल के लिये ही सही
tuutaa हैं तन्मय दिल

मोंगरे की खिली पंखुरियों के सदृश्य
श्वेत रंग में लीन
शिखर पर -
एकाग्रचित हैं स्थित
वह शांत स्थिर
सौम्य मौन मन्दिर

किशोर




मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

हमारे चेहेरों की परछाईयाँ


तुम्हारे चेहेरे का प्रतिबिम्ब


सपनों की नदी में बहते हुवे मेरे सपनों के तट तक पहुंचता हैं


उस चेहेरे कों मैं अपनी हथेली में रख कर गौर से निहारता हूँ


बिंदियां में रंग सा खुद कों भरा पाता हूँ


सीप जैसे ...सुन्दर नयनों के भीतर स्वयं की तस्वीर कों जड़ा हुआ पाता हूँ


मुझे इतने समीप पाकर सपने में भी वह मुस्कुराने लगती हैं


और


उसके अधरों की दो पंखुरियां खिल जाती हैं


रेशम के धागों के सदृश्य उसके अलकों के महीन जाल में अपने ध्यान कों उलझा हुआ पाता हूँ


उस्के गालो का स्पर्श पाते ही मेरी उंगलियाँ फिसल सी जाती हैं


हम दोनों महसूस करते हैं


कि -


हमारे चेहेरों की परछाईयाँ इसी तरह रोज रात कों


एक दुसरे की हथेलियों पर सर रख कर सोती हैं


किशोर

रविवार, 4 अप्रैल 2010

फिर लौट आया प्यार का मौसम


फिर लौट आया प्यार का मौसम

अनुराग से भरी होगी शिकायत

दूर क्यों मुझसे रहते हो

जब नजदीक हैं हम

फिर लौट आया प्यार का मौसम


रजनीगन्धा सी महकेगी रात

जब मुझे आयेगी उसकी याद

चांदनी कों बुलाकर वह पूछेगी

सचमुच करते हैं क्या वे मेरा इंतज़ार

जान कर सच

तब बड़ जायेगी उसके ह्रदय की धड़कन

फिर लौट आया प्यार का मौसम


एक धुन गूंजती रहेगी

मन की अकुलाहट बाँसुरी सी बजती रहेगी

बार बार दुहराएंगे .........

सात जन्मो तक न अब बिछड़गें हम

फिर लौट आया प्यार का मौसम


किशोर

मुझे दिन काटते रहें


मुझे दिन काटते रहें

रातो के बिस्तर काँटों से चुभते रहें

नींद मुझसे कोसों दूर रही

दर्द के उजालो में मै अपनी ही किताब पढ़ता रहा

किसी की याद में भीतर ही भीतर दुःख की नदी में बहता रहा

फिर भी शेष रहा ....यह सोच कर कि -कभी तो किनारों के हाथ मुझे खीच लेंगे

और फिर...मेरे साथ सपने होंगे

साँझ और सुबह के सुनहरे पल होंगे

लहरों के पांवो के पायल में बजते हुवे नुपुर के मधूर स्वर होंगे

लेकिन इसे पाने के लिये मुझे रोते हुवे कोई न देखे

इसलीये मैं ज्यादा हँसने लगा

चेहेरे पर नया आवरण मढ़ने लगा

पर उसे मेरी वेदना का अहसास -हैं या नहीं

मुझे ज्ञात नहीं ...मेरे ओंठ कहते हैंहमने तो कह दिया हैं

तुम ही हो जिसकी हम पूजा करते हैं

अब सब्र करो

शांत रहो

विरह की इस पीड़ा कों सहो .......

किशोर

तीन ..मुक्तक

तुम वहीं हो बचपन की एक सजीव तस्वीर
जिसे मालूम हैं मैं उसी के रहता हूँ करीब
इतने साल लग गए पर कोई बात नहीं
वो तो थी ही मेरे पास
पर न था पास मेरे केवल उसके जिस्म का लिबास
अब हम रहेंगे साथ साथ
वह कविता हैं मेरी मै हूँ उसका कवि
वो सागर मैं नदी
कभी मैं तट
मेरी बांहों में वह बह चली
जियेंगे इसी तरह फिर न जाने कितनो सदी

किशोर


बचपन से थी बस यहीं चाह
कोई तो sune मेरे मन की बात
पर जिसे चाहूँ मैं और उसके सपनो के अनुरूप भी हौऊ
मैं कभी बचपन के खेलो कों कों करे याद
कभी यौवन के रंगीन बादलों पर हो सवार
और
उम्र की अंतिम घडियों तक banaa rahe yah अटूट प्यार
बस यही था ...
मेरी जिन्दगी का मकसद जो तुम मिल गए आज

किशोर


बहुत याद आयी उनकी दोस्ती
उनके शहर छोड़ जाने के बाद
फिर न कभी आया उनका ख़त
पर उन्हें हम भूल न पाए जीवन में सब पाने के बाद
लगता रहा कुछ खो गया हैं
हर चौराहे हर मोड़ पर एक हमदर्द साये सा उन्हें खडा पाया
आधी उम्र भी अपनी गुजर जाने के बाद

किशोर

आज दिल मेरा


आज दिल मेरा

देवता की आरती का बन गया दिया

कभी लगता हैं -वे ही मन्दिर हैं

और मैं हूँ उन तक पहुँचने के लिये -बनी सीडियां

पर उनकी ,.......

मुझसे नाराजगी का सबब बरसो बाद समझ आया

जब रुखसत के वक्त उन्होंने मुझे बताया

तेरी याद में इस तरह रहा खोया कि -

तुम्हें यह बात बताने का मुझे अवसर मिल न पाया

चाहा था कि

एक बार तेरी निगाहों के समंदर में ड़ूब जांऊ

पर मुझ मंझधार से किनारा इतना दूर था कि

तुझ तक कभी पहुँच न पाया


kishor

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

यही हैं एक सच


कैसे करू स्वयं कों अभिव्यक्त
तुम्हारे स्मरण की अमिट छाप हैं मेरे मन पर अंकित
और उसका प्रभाव भी हैं मुझ पर सशक्त
तुम्हारी दृष्टी के व्यापक कोण के आभास से घिरा रहता हैं मेरा सम्पूर्ण व्यक्तित्व
तुम्हारी घनी अलको का भूल नही पाता मैं सुखद स्पर्श
तुम्हारी सांसो के सुंगंधित हैं उच्छ्वास
तुम्हारी अधरों पर ठहरा पाता अपना नाम
तुम्हारे मस्तक की रेखाओं पर लिखा रहता हैं मेरे लिये चिंता का अहसास
यही हैं एक सच
जिसके आधार पर मैं सोचता -प्रवाहित हैं हर फूल पौधों और प्रकृति में यह प्राण
प्रेम की अनुभूति के बिना इस जग में कण कण बूंद बूंद जन जन कों देख असहाय
कैसे बहेगी मन में करुणा की धार
किशोर

वह खामोश थी


वह खामोश थी

हालांकि -उसे मालूम था सामने बैठा हुवा शख्स उससे बहुत प्रभावित हैं

वह उसके चित्र बनाता हैं और उसके हर भाव पर काव्य रचता हैं

बहुत देर बाद उसने मुझसे कहा -

हमसे बड़ी हमारी कवितायें हैं हमारी पेंटिंग्स हैं

मैंने महसूस किया कि -वह ठीक कह रही हैं

इस शांत और संयमित मुलाक़ात के बाद

मैं उसे अभिवादन कर बाहर आ गया

मुझे अब धूप में चमक कम लग रही थी

सूरज नदी से बहुत ऊँचाई पर था

फिर भी गमलो में खिले फूलों के रंग कुछ फीके लग रहें थे

ऐसे ॥ वह पास ही खडी थी मुझे आज के अंतिम नमस्कार के लिये

तभी मुझे याद आया ......

मैं उससे उसकी कविता नहीं सुन पाया हूँ

न ही वह लोरी जिसे मैं मन ही मन रोज रात सोने से पहले सुनता हूँ

और न ही मैं उसके आँचल के छोर से पानी से तर अपने ओंठो कों पोंछ पाया हूँ


शायद इस जन्म में मिला -उसके प्रेम के स्पर्श का एक शुभ अवसर ....

मेरे हाथ से फिसल चुका था

मैंने देखा फर्श पर बिखरे कांच के काल्पनिक टुकडो में हमारी आत्माए

हमारे इस संकोच पर एक साथ खडी हुवी मुस्कुरा रही थी


किशोर