सोमवार, 22 मार्च 2010

तम का होगा गहरा प्रकाश


जा दूर कही तू वियोग

आज हुवा हैं

मेरा मेरे प्रिय से संयोग

जगत -प्रतिस्पर्धा में

प्रथम रहने का मोह छोड़

मुझसे मिलने आये वे

यह मेरे लिये हैं

एक बहुमूल्य संजोग


प्रतिदिन करती हूँ मैं श्रृंगार

मन ही मन में

जारी रहता हैं उनका ध्यान

आंसूओ से भर जाती हैं आँख

आती हैं जब भी उनकी याद

लगता हैं इंतज़ार में उन्के

छूट न जाए मेरे प्राण


पदार्पण होते ही घर आँगन में

स्वागत हेतु खडी मिली हैं

उन्हें आज ,गृह के द्वार

मेरी मृदु मुस्कान

प्रेम में कुछ मिश्रित

यौवन का भी हैं ज्वार


उन्के नयनो के तीरों से

मैं वेदना ..बिंधना चाहती हूँ

सहृदय आर -पार

सूर्यास्त होते ही जब -

तम का होगा गहरा प्रकाश

तब देखेंगे

मौन मौन के दृष्टी कोण साश्चर्य

हमारे अन्तरंग प्रेम का सजीव उलास


किशोर



6 टिप्‍पणियां:

Babli ने कहा…

मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! इस उम्दा रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!
मेरे ब्लोगों पर आपका स्वागत है!

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

तम का होगा गहरा प्रकाश


तब देखेंगे


मौन मौन के दृष्टी कोण साश्चर्य


हमारे अन्तरंग प्रेम का सजीव उलास


sunder bhav.....!!

kishor kumar khorendra ने कहा…

Babli

ji

shukriyaa

kishor kumar khorendra ने कहा…

harkirat hir jii

shukriya

aur manobal badayee

jenny shabnam ने कहा…

kishor ji,
man ki gahraaiyon se sansaar ke vistar tak pahunchti hai aapki rachna, bahut sundar, badhai sweekaren.

kishor kumar khorendra ने कहा…

ny jii shukriyaa