शनिवार, 6 मार्च 2010

वह पाषाण नहीं इंसान थीं


मैंने उससे पूछा

तुम्हारे जीवन में नहीं ,लेकिन

क्या तुम्हारे सपनो में

आ सकता हूँ

उसने कहा -नहीं


तुम्हारे घर के दरवाजे मेरे लिये बंद हैं

मगर क्या मैं

रेल की तरह

तुम्हारे शहर से गुजर सकता हूँ

उसने कहा -नहीं

मेरे नाम और मेरे पते ने कहा -

हम भूलना चाहते हैं

इस शख्स कों ......

क्या अनुमति आपसे मिल जायेगी

उसने कहा नहीं


यहीं तो ईसकी सजा हैं

इसे न खुद कों भूलना हैं ..न ..मुझे

क्योकि -

इसने मुझसे प्यार करने का जुर्म

मेरी सहमती के बगैर कीया हैं


फिर मैं उसे भूलने के लिये

कभी -समुद्र के किनारे गर्म रेत पर

एक बूंद की तरह लेते गया

कभी -मेरा शरीर काँटों सा बिछ गया

कभी -मेरे पाँव अंगारों कों पार कर आये

कभी -फुटपाथ पर बिखरे खली दोनों सा

भूखा रह गया

कभी -मृत देह कों ले जाती भीड़ में शामिल हो

चिता तक चला गया

अंत में मुझे थका हुवा और पराजित जानकर

सीढियों ने मन्दिर के करीब बिठा लिया

और तब -

बजती हुवी घंटियों ने मुझसे पूछा -

आखिर तुम्हें हुवा क्या हैं

मैंने कहा -मैं जिसे भूलना चाहता हूँ

वही मुझे ज्यादा याद आ रही हैं

मैं अभिशप्त हूँ

चबूतरे की सारी प्रतिमाओं की आँखों से

एकाएक आंसू बहने लगे

वे नतमस्तक थे

मुझे प्यार करने का दंड मिल चूका था

मेरी व्यथा सुनकर पत्थरो में भी जान आ गयी थी

यह और बात हैं

उसे रसकी जानकारी नहीं थी

क्योकिं -

वह पाषाण नहीं ..इंसान थी

किशोर



2 टिप्‍पणियां:

Asha Pandey Ojha ने कहा…

"वह पाषाण नहीं इंसान थीं"

par wah pashano se jyada kathor thee..dard hee dard

kishor kumar khorendra ने कहा…

ji vah sach me pashan se jyada kathor hain

shukriya asha ji