सोमवार, 22 मार्च 2010

तम का होगा गहरा प्रकाश


जा दूर कही तू वियोग

आज हुवा हैं

मेरा मेरे प्रिय से संयोग

जगत -प्रतिस्पर्धा में

प्रथम रहने का मोह छोड़

मुझसे मिलने आये वे

यह मेरे लिये हैं

एक बहुमूल्य संजोग


प्रतिदिन करती हूँ मैं श्रृंगार

मन ही मन में

जारी रहता हैं उनका ध्यान

आंसूओ से भर जाती हैं आँख

आती हैं जब भी उनकी याद

लगता हैं इंतज़ार में उन्के

छूट न जाए मेरे प्राण


पदार्पण होते ही घर आँगन में

स्वागत हेतु खडी मिली हैं

उन्हें आज ,गृह के द्वार

मेरी मृदु मुस्कान

प्रेम में कुछ मिश्रित

यौवन का भी हैं ज्वार


उन्के नयनो के तीरों से

मैं वेदना ..बिंधना चाहती हूँ

सहृदय आर -पार

सूर्यास्त होते ही जब -

तम का होगा गहरा प्रकाश

तब देखेंगे

मौन मौन के दृष्टी कोण साश्चर्य

हमारे अन्तरंग प्रेम का सजीव उलास


किशोर



गुरुवार, 11 मार्च 2010

क्या यही प्यार हैं ...




जब उसने मेरी ओर ध्यान नही दिया


तो


मैंने भी उसे किसी का होने नही दिया


क्या यही प्यार हैं ...


उसे मेरी कविताओ से प्रेम था


और


मैं उस पर रोज एक कविता लिखता था


लेकिन


यह बात वह नही जानती थी


बहुत सालो बाद


जब मैं उससे मिला


तब तक वह मेरी कविताओ कों पढ़ते पढ़ते


मेरी कविताओ का शब्द बन गयी थी


मुझे मालूम था


वो मेरी आत्मा के अमृत से भर गयी थी


तब मैंने उससे कहा


मुझे आपसे मोहब्बत हैं


मैं आपका नाम लेते हीं -एक कविता लिख लेता हूँ


संसार के सारे फूलो की सुगंध में डूब जाता हूँ


मैं खुद चांदनी सा प्रकाश बन जाता हूँ


पर


उसके भी कुछ सिद्दांत थे


उसे बस ...मेरी कविताओ से मोहब्बत थी


kishor

शनिवार, 6 मार्च 2010

वह पाषाण नहीं इंसान थीं


मैंने उससे पूछा

तुम्हारे जीवन में नहीं ,लेकिन

क्या तुम्हारे सपनो में

आ सकता हूँ

उसने कहा -नहीं


तुम्हारे घर के दरवाजे मेरे लिये बंद हैं

मगर क्या मैं

रेल की तरह

तुम्हारे शहर से गुजर सकता हूँ

उसने कहा -नहीं

मेरे नाम और मेरे पते ने कहा -

हम भूलना चाहते हैं

इस शख्स कों ......

क्या अनुमति आपसे मिल जायेगी

उसने कहा नहीं


यहीं तो ईसकी सजा हैं

इसे न खुद कों भूलना हैं ..न ..मुझे

क्योकि -

इसने मुझसे प्यार करने का जुर्म

मेरी सहमती के बगैर कीया हैं


फिर मैं उसे भूलने के लिये

कभी -समुद्र के किनारे गर्म रेत पर

एक बूंद की तरह लेते गया

कभी -मेरा शरीर काँटों सा बिछ गया

कभी -मेरे पाँव अंगारों कों पार कर आये

कभी -फुटपाथ पर बिखरे खली दोनों सा

भूखा रह गया

कभी -मृत देह कों ले जाती भीड़ में शामिल हो

चिता तक चला गया

अंत में मुझे थका हुवा और पराजित जानकर

सीढियों ने मन्दिर के करीब बिठा लिया

और तब -

बजती हुवी घंटियों ने मुझसे पूछा -

आखिर तुम्हें हुवा क्या हैं

मैंने कहा -मैं जिसे भूलना चाहता हूँ

वही मुझे ज्यादा याद आ रही हैं

मैं अभिशप्त हूँ

चबूतरे की सारी प्रतिमाओं की आँखों से

एकाएक आंसू बहने लगे

वे नतमस्तक थे

मुझे प्यार करने का दंड मिल चूका था

मेरी व्यथा सुनकर पत्थरो में भी जान आ गयी थी

यह और बात हैं

उसे रसकी जानकारी नहीं थी

क्योकिं -

वह पाषाण नहीं ..इंसान थी

किशोर