बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

प्रेम मे कुछ भी न करना निश्चित

वह कहती है
प्रेम मे कुछ भी न करना निश्चित
न मिलने का वक्त
न बिछड़ने का समय
जैसे
हम जीते है वर्तमान कों
यह जाने बिना कि -
अगले पल मे
हमारे जीवन का क्या है भविष्य
सचमुच चाहते हो मुझे
तो प्रेम मे भी
न ले आना -नियम और शर्तो की
फिर बेड़िया मेरे मीत
चाहती हू मै तुम्हें पूरा
लेकिन कितना चाहते हो यह पूछकर
मुझसे
प्यार कों मत कर देना सीमित
स्वप्न मे भी आना
पर
आकरयह न कहना ॥
बस यही रह जाओ
जागरण मे तुम्हारा
अविरल स्मरण भी तो मुझे है स्वीकृत
जीवन है तब तक ही होता है
प्रेम यह विचार अपूर्णता पर है आधारित
मृत्यु के पश्चात भी प्रेम ही शेष रहता है
मुझे हर हाल मे याद करना
संयोग और वियोग कि
परिस्थितियों से हुवे बिना प्रभावित
इसलीये अब मै नहीं होता उसके व्यवहार से अचंभित

तुम्हें देख सम्मुख
कुछ पल के लिये सब भूल जाता हू
खुद से हो पराजित
लेकिन तुम्हें बिदा कर याद मे
फिर तुम्हारे
खुद कों खोकर फिर हो जाता हू
मै पुनर्जीवित
इसीलिए वह कहती है
कुछ भी मन मे न कर
लेना निश्चित

किशोर

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