शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

वह ...साकार



उसके असीम प्यार की


सीमा कों लांघकर


बहुत दूर निकल आया हूँ


ऐसा लगता हैं -


पहाड़ों के मजबूत हाथो ने


मुझे धकेल दिया हैं


और


समतल जमीन


नीचे की ओर धंसती जा रही हैं


मै हवा की बांहों मे हूँ


पर


मैं खुद हवा की देह कों छू नहीं पा रहा हूँ


काश ........


कल्पना के आकाश मे उड़ते


इन बादलो के पास -


कमरे होते


तो मैं वही रुक जाता


कुछ दिन


कुछ पल


यहाँ यही पर ठहर कर


पूरी उम्र व्यतीत कर लेता


मैं चाहता था ........


ऊपर उठना


पर


प्रेम के शिखर से ऊपर


पर्वतो के पास


और कुछ था भी नही


जहा से मैं और ऊँचाई तक चढ़ पाता


इसलीये


मुझे ......


प्रपात के करूं जल की तरह


उतरना तो था ही


अब मैं ..


बहती धारा की गोद मे समाहित हूँ


मुझसे सूख और दुःख के


किनारों ने कहा हैं -


अब तुम हमारे साथ साथ बहना


इस दुनिया मे इसे ही जीवन कहते हैं


कभी रेत पर बिखरे


पत्थरो के टुकडो पर


रेंग कर देखना


कभी बबूल के काँटों कों


छू कर देखना


कभी वन के वृक्षों की


हरी बातो कों सुनना


क्योकि -


सत्य .. सिर्फ ....


भाव है न आकार


दोनों से मिलकर होता हैं ...वह ..साकार


पैदल चलते करोडो मनुष्यों के


छालो के दर्द कों सहना


तब प्यार कों समझ आयेगा .........


की -


सचमुच .........


बिछी धूप की आंच


काँटों की चुभन


और .......


ऊँचाई पर स्थित प्रेम के स्वर्ण -कलश


के लिये .........


तुम्हारी आँखों मे भर आये अश्रु मे


कोई फर्क नही हैं


किशोर












4 टिप्‍पणियां:

श्रद्धा जैन ने कहा…

bahut hi gahri abhivayakti prem ki

Asha Pandey Ojha ने कहा…

काश ........



कल्पना के आकाश मे उड़ते



इन बादलो के पास -



कमरे होते



तो मैं वही रुक जाता



कुछ दिन

bahut sundar...

kishor kumar khorendra ने कहा…

shraddha ji shukriya

kishor kumar khorendra ने कहा…

asha ji bahut shukriya