बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

आँखे होती जाती है

वृक्ष की डाल से उतरती है
एक् गिलहरी
शीर्ष के छोर पर बैठा हुवा है
एक् पंछी
आकाश पर टहलते
बादलो की आँखों मे
धरती की अनेक तस्वीरे
है उभरी
जड़ो के पास पहुचते ही
थकी हुवी धूप की -शांत हुवी है
साँसे उखड़ी
नदी के जल कों
अपनी अंजुरी मे
भर बालूओ पर
बिछी आग कों बुझाने
हवा ने बिखेरी है दूर तक
शीतल बूंदों की लड़ी
शुष्क पत्तो की वर्षा के
मर्मर स्वर कों सुन कर
मौन के घर की खिडकिया
है सहमी
वन के एकांत कों लग रहा -
इन सब सजीव दृश्यों का
वह कब तक बना रहेगा एक् मात्र
मूक प्रहरी
मुझसे कहती है
शाखाओं पर छायी ...पत्तियों की
सुन्दरता हरी
सच के आवरण कों
बस
देखता है हम सबका बाह्य अवलोकन
पास जाने पर
सच की नदी की सतह की
आँखे होती जाती है -
बहुत सुन्दर
और
और गहरी

किशोर

कोई टिप्पणी नहीं: