शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

मै कह रहा हू सच

तुम्हारा

हर वाक्य -
हर शब्द ....

मुझसे लिखवाता रहा -कविता
और ..
धीरे धीरे
शब्द -निमग्न
कर गयी -मुझे
पवित्र .....
भावनाओं की यह काव्य -सरिता

मेरे व्यवहार मे
देख संकोचवश
एक् तरह की -औपचारिकता

तुमने कहा -
मुझे छोड़
बहुत आगे निकल गयी है

तुम्हारी कल्पना -शीलता


पर मै कैसे कह पाटा -
तुम्हारी और मेरी
देहो से अलग -
हमारी है ......
एक् ही आत्मा

आज भी मै चाहता हूँ
तुमसे -
नींद आने से पहले सुनना
एक् गीत
तुम्हारे शब्दों की उंगलियों के स्पर्शो से
मेरे मन कों भा जाए वह संगीत

कुछ भी छुटा नही है -
न तुम ..न मै
वही नदी है ......वही है तट
मै लौट आया हू


तुम्हारी और मेरी
उंगलियों कों - पकड़
साथ मे चलेगी
हमारी कल्पना
मै कह रहा हू सच
मै कह रहा हू सच


किशोर

कोई टिप्पणी नहीं: