शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

जाते जाते कह रहा बसंत

टहनी पर खिले हुवे है फूल

उड़ते हुवे बादलो कों रुई सा -

आकाश रहा धुन

किनारों कों -नदी की लहरे भी छू रही बार बार -

पाकर हवा मंद मंदअपने अनुकूल

पत्तियों पर बन ...हरा रंग

खुद खुश हो रही धरती पर फैली हुवी - धूप

हिचकोले खाता ...सागर का जल

पृथ्वी कहती -देखो ...मै रही हू घुम

क्या मुझसे भी प्यार करोगे कहता पंखुरियो से

उन्हें चुभ कर -नुकीले शूल

हर हथेली की -रेखाओं पर -

सरसों और पलाश का रंग

भरने आया है फ़ीर फागुन

मल लो प्यार के इन्द्रधनुष कों पीसकर

आपस मे ॥चेहरों पर ..मनुज तुम

बस मुस्कुराते हुवे

शेष रह जाते चमकते श्वेत दन्त

मुख के बाक़ी हिस्सों पर -

कालिख पोत देता है होली मे हुड़दंग

पर पानी तो बचा लेना ....अपने लिये -

जाते जाते कह रहा बसंत

बहा देना इस बार -मुखौटे कों भी ...घिसकर -

मिश्रित रंगों के संग

फिर न रह जायेंगे -जीवन मे -

धर्म ॥जाति ..और नस्ल के विभिन्न झूठे दंभ

हवा कों भी सांस लेने देना

वृक्षों कों जलाकर -न ज्यादा फैलाना धूम

टहनी पर खिले हुवे है फूल

किशोर

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