बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

निहारते रहना चाहता हू

तुम्हारे हिरदय के
कोमल अहसासों से बनी
घाटियों से
एक् प्यार की नदी
उतरकर
मुझ तक पहुचती है

और

भावनाओं से भींगे
रेत के समतल तट पर
हरे हरे
नन्हे पौधों के सदृश्य
मै ......
ऊग आता हू


तुममे व्याप्त
दर्दयुक्त ...
जल की प्यास बुझाने के लिये
मेरी जड़ो से निसृत
मिश्री कणों से निर्मित
शब्दों से -सृजित ...
कविता की तरह
तुम्हारी आँखों की तरल नमकीन देह में
मै
विलय हो जाना चाहता हू

हालाकि -
सुविचारो के घुमड़ते श्वेत बादलो की तरह
तुम्हारे समीप से भी
मै
गुजरता हू

पर
तुम्हारे मन के घर की
एकाग्रचित
खिडकिया ध्यानमग्न है
इसलिए -

तुम मुझे न देख पाती हो
न मेरे पांवो की
धीमी आहात को
सुन पाती हो

और .......

मै भी तुम्हे
सुकून के छत पर
सुखद समीर के संग
बैठे रहने देना चाहता हू

तुम्हे बिना छुए
तुम्हे बिना जगाये ........

तुम्हे एक् खूबसूरत
सजीव
प्रतिमा की तरह
बस .......

निहारते रहना चाहता हू

किशोर