शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

शर्त

रेल से उतरते ही
मुझे
अहसास हुवा
अब भी
मै तनहा
नही रह पाया हू

मेरे पास ...
मेरी उंगलियों कों थमा हुवा एक बैग था

उस बैग मे
कुछ कोरे
कुछ भरे ....
पन्ने थे ............
मैंने उसमे अपने कपड़ो की तरह
अपनी देह कों भी -
ठूंस ठूंस कर
भरना चाहा था

पर उस बैग मे ...........

उतनी जगह नही थी

उसने कहा था ..आप हो कवि
और मै

रोज शब्दों का दान आपको कर सकती नही
मैफिर
एक लम्बी यात्रा पर निकल पडा था

लेकिन

हर खतरनाक मोड़ पर भी
मै बचता गया

इसका मुझे काफी दुःख था .........

अब भी मेरे समक्ष
लोगो से बने समुद्र
और
मेरे बीच ....रेत ही रेत है
पर मेरे पास तुम्हारे कहें हुवे शब्द नही है

मै इस महा पृष्ट पर
अब कैसे लिखू कविता

और वह यही शर्त दुहराती है
की
मुझसे प्रेम करने के लिये
कोई शर्त न हो

किशोर

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