शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

न तुम कमीज हो

न मेरे मन के पास तुम्हें रोकने के लिये

दरवाजा है



तुम्हारी आँखों की खिडकियों मे -

मेरी आँखों कों तुम्हें देखने से -

मना करने के लिये ...

अब पर्दा ही लगा है

ऐसे भी -एक् दुसरे कों जानने के बाद -

न तुम कमीज हो

और

न मै रह गया हू देह

कि

-एक् दुसरे कों पहन सके

तुम अगर आकाश के बादलो कों छूने भी चली जाओगी

तो भी -

मैतुम्हारी चमक के सहारे ...

तुम तक पहुच ही जाउंगा

मृत्यु के उस पार भी

मै तुम्हें -खडा मिलूंगा ....

इंतज़ार करता हुवा

यह और बात है

कि -

शायद तुम मुझे पहचान लो

या
-न भी पहचानो ...

किशोर

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