मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

तुम हो अनामिका

तुम हो अनामिका
जिससे मैंने
बिना ...पता ,नाम ,जाति धर्म के
मानव होकर
है जीना सीखा
तुम्हें अपनी पूजा के बदले
गुरु से आशीर्वाद है मिला
तुम अनाम हो
पर बहुमूल्य शब्दों से बनी हुवी
हो एक् अंतहीन कविता
मै तुम्हारी भक्ति और
ज्ञान के समक्ष नतमस्तक हू
क्या ..तुम हो -
शिव की जता से
उतारी गंगा की भाति
एक् पवित्र सरिता

तुम्हें आदी शक्ति ने यदि
कुछ वरदान है दिया
तो तुम मेरा भी मंगल कर दो
जीते जी मै भी हो जाऊ
ज्ञान ज्योति से प्रज्वलित हो
इस ब्रम्हांड रूपी मंदीर मे
एक् कभी न बुझाने वाला
जलता हुवा दिया

तुम हो परिचित गूढ़ रहस्यों से
मै बस अगोपनीय ॥
फूल ,पत्ती ,
कूल ,नदी
पर्वत ..सागर ..और लहरों
के मेलो मे
खेत और खलिहानों मे
कभी जीवित या कभी
कटे हुवे फसलो सा -बिछा

तू हो अनामिका
मौन के अक्षरों कों साधकर
स्वयं बन गयी हो एक् गीता

किशोर
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