शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

तुम सुमन हो मै रहू सदा बन कर महक




हर पल मुझे महसूस होता है तुम्हारी काल्पनिक उंगलियों का कोमल स्पर्श



लगता है -मुझे पन्नो सा पलटकर तुम पढ़ती हो सहर्ष



रुक जाती है जब मेरी कलम




तब तुम कहती हो -इसे लिखो ...




यह है इस कविता के लिये उपयुक्त शब्द



तुम्हारी और मेरी -भावनाओं और विचारों के एकत्व




के पश्चात -




एक् दूसरे कों याद करते रहना ..अब




महत्वपूर्ण है हम दोनों के मध्य



तुम्हारे बिना मै चल नही पाताएक् भी कदम



फिर भी तुम




कभी कभी कह देती हो मुझसे -"




मुझे भूल भी जाओगे तो आपके लेखन से मिली मानसिक संतुष्टी




मेरे लिये सात जनम तक न होगी कम



तब मै कांप जता हू भीतर ही भीतर डर ....




मै चाहता हू -इस तरह से भूलने -भूलाने की बाते




मुझसे तुम कभी न कहना ....चाहे फिर वह क्यों हो न स्वप्न



तुम सुमन हो मै रहू सदा बन कर महक



किशोर

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