रविवार, 7 फ़रवरी 2010

मन ही मन ...



मन ही मन


मै उससे करता हू


निरंतर वार्तालाप


बदले मे


उसके नयन करते है


मुझसे -मूक संवाद



चाहे


इंजन के शोर से


भरा हो प्लेटफार्म


या


सड़के-


ट्रेफिक से से हूँ जाम


मेरे भीतर -उसकी परछाई ..


होती ही है साथ


उसे -


मुझसे अलग नही कर पाते


सागर की उंची उंची -


लहरों के भी हाथ


हमारी खामोश बातो कों


अनसुना कर


जानते हुवे भी -


अनभिग्य रहता है


खुला सारा आकाश



हमारे इस अदृश्य मिलन कों


कोई नही पाटा जान


न नदी के -


शाश्वत मोड़


न लहरोको छूकर ॥


सीढियों सा -


किनारों तक चढ़ते आये


बेतरतीब पाषाण


दुनिया वालो की दृष्टी मे -


मानो -


छिपने मे ...


हम दोनों के अंतर्मन हो निष्णात



ऐसे तो -


जीवन मे -


प्रतिकूल ही बहती है वक्त की धार



कभी वह बन जाती है


नाव


कभी मै बन जाता हू


पतवार



थक जाते है तो -


आओ करो विश्राम


यह कह कर


बुला लेती है .......


रेत पर बिखरी ॥


बबूल की छाँव



मै उससे पूछता आया हू -


कब तुम


सचमुच बोलोगी


और मै सुनूंगा कल्पना ॥!


तुम्हारी मधूर आवाज


लेकिन ......


आज जब उसने कहा


स्वप्न मे -मै बोल रही हू ,तुम्हारी कल्पना


मै तो हू ही तुम्हारे हरदम पास



फिर उसने मुझसे कहा


तुम लिखते रहना


तब तक कुछ


घंटो मे मै लेकर आती हू


तुम्हारे लिये प्रसाद


तबसे बैठा मै -यथार्थ ...


कर रहा हू


अपनी कल्पना का इंतज़ार


उसे मुझे बतलाना है -


बिना कल्पना के



मुझ यथार्थ कों ...


इस जग के सारे दृश्य ...


लगने लगते है


निमिष भर मे


बेजान और निस्सार


किशोर













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