शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

मै हू एक् कविता ..

लगता है
मै ..कवि नही
एक् हू कविता

और तुम हो
मुझ
इस कविता की रचयिता

मेरी परछाई के बीज से
तुम्हारे मन के गमले मे
अंकुरित हुवा है एक् प्रेम का पौधा

जिसकी जड़ो मे -
तुम्हें सींचना पड़ता है
रोज -
प्यार का जल मीठा

उस पर खिले गुलाब की
पंखुरियो के रंग मे
तुम्हारी उंगलियों का
सुकोमल स्पर्श है ..मिला

तुम चाहती हो -
उसकी टहनियों मे
सदा -
ऊगी रहें नन्ही हरी पत्तिया

मै चाहे कवि होऊ
या एक् अंतहीन कविता
या नर्म हरी पत्तिया

पर

तुम्हारे विचारों के मन की
घाटियों मे -
तुम्हें पुकारता हुवा हू जीता

जब भी
तुम्हें
तुम्हारी तन्हाई मे
आ घेरेगा तम कोई सीरा

मै जल जाउंगा
ऊसी क्षण ...
तुम्हारे भीतर एक् दीप sarika

lagata hai mai kavi nahii
mai huu ek kavitaa

kishor

कोई टिप्पणी नहीं: