सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

तुम ही हो वह कौन



आँगन मे -


एक् सायकल है और कार


और उगे है कुछ


-सिर उठाये से झाड


मै एक् ग्रामीण


आया हू


अपने


मित्र से


मिलने -


शहर पहली बार



मेरे मन की जेब मे रखे


पर्स मे -वह खरे सिक्के की तरह


रखी हुवी है


उसकी यादों से बने


मेरे रूमाल ने -


उसके द्वारा शहर आते समय


दीये हुवे ...


एक गुलाब के फूल


और


कुछ कांच की गोलियों कों


अपने सीने मे -


छिपा रखा है



उसके दरवाजे तक आने से पहले


मुझे छू गयी


कमरे की शालीनता


जैसे वह


पहचान गयी हो


कह रही हो


तुम ही हो वह कौन


जिसके -रोज


किस्से सुनाता .है .मुझे


इस घर के हर कोने मे


उपस्थित ...मौन





किशोर





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