सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

माँ ..माँ ..


वो सब कहानियां

मुझे -याद है

और वो लोरी भी

जिसकी आखरी लाईन

सुनने से पहले -

मै अक्सर सो जाया करता था


मै घर मे सबसे छोटा हू

इसलीये -

पचपन की उम्र मे भी

अपने बचपन कों -

माँ के लीये पार नही कर पाया हू

मेरे घर लौटने मे देर होने पर

वह

आज भी घबरा जाती है

उसे डर लगता है ....

मै दुनिया की इस भीड़ मे कही कहो न जाऊ


और मै ...जानता हू

कुछ बरसों बाद -

मै उसे देख नही पाउँगा

फ़ीर उसे -

उसकी सुनायी कहानियो मे धुधुन्गा


वह आजकल मुझे -

चुपचाप गौर से देखती है

उसकी कमजोर हो गयी नजरो कों

मै और साफ़ दिखायी देता हूँ


मै उसके घुटने मे दवाई लगाता हूँ

और वह -

अपना दर्द भूल जाती है


उसने ही मुझे -

जीना ..और चलना सिखाया है

अब

वह मेरे सहारे चलती है


उसे भी मालूम है है और मुझे भी -

कि -

हम दोनोके बीच कोहरे की दीवार

उठ रही है


उसे मेरी आवाज कभी कभी

कोहरे के इस पार से -

सुनायी देती है

तब मै कह रहा होता हूँ ...

माँ माँ ....


किशोर


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