मंगलवार, 12 जनवरी 2010

हाँ ..मै हू एक् बालक का मन

हाँ मै हू ...
एक् बालक का मन
मेरे विचारों की उंगलियों कों ...
वृक्ष की टहनियों ...!
हमेशा पकडे रहना

माया के के झमेले मे
रेत के टीले सा -मुझे उठा
हवा उड़ा न दे कहीं

नदी अपने प्यार के
जल की नमी से
मुझे जकडे रहना

कभी पहाड़ से समुद्र कों
कभी समुद्र से पहाड़ कों
आश्चर्य से देखता हू
दोनों के बीच की ये दूरी -
मुझे भटका न दे कही

अरी ! पृथ्वी की धुरी
मुझे अपनी ममता की डोर से
बाँध कर रखना

मुझे चाहिए प्रकृति ...!
तुम्हारे दूबों की तरह उगे
हरे रंगों का कोमल स्पर्श

मुझे पता नही धन की आश मे
मनुष्य क्यों करते है
आपस मे संघर्ष

हे जिन्दगी ...!
मेरी भावनाओं के निर्झर कों
स्त्रोत सा -विशुद्ध ही रखना
उड़ानों कों देखकर
मै हू दंग ...
मेरे जीवन के रंग की
सुन्दर है पतंग

हे मेरी कल्पना ...!
उसे बस अपने हिरदय के
नीले आसमान मे ही
बस उड़ते रहने देना
मुझ अबोध का
अब तुम ही हो सर्वस्य
मै ही हू
तुम्हारे दिवस और तुम्हारी निशा
की आँखों मे बसा
एक् सच्चा स्वप्न

कल्पना ,तुम भी हो मेरे लीये
कहाँ किसी से कम
तुम हो कहानियो की परियो से
आयी हुवी एक् परी मेरे संग
हाँ ,मै हू एक् बालक सा मन

किशोर

2 टिप्‍पणियां:

श्रद्धा जैन ने कहा…

bachche ke man ko bahut achche se likha hai aapne
aapki kavitayen hamesha man ko chhuti hai
likhte rahen

kishor kumar khorendra ने कहा…

sab aapki prashansa ka hi parinaam hain

shukriya shrddha ji