शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

तुम्हारी परछाई से बनी है मेरी कल्पना


तुम्हारी परछाई से बनी है
मेरी कल्पना
तुम बोलती हो जो
वही होता है मेरा लिखना

इस बात कों तुम जानती हो
फ़ीर भी पूछती हो रोज
कहाँ से मिलती है मुझे
कविता रचने की प्रेरणा

तुम्हारी परछाई से बनी है मेरी कल्पना

तुमसे मिलने से पहले
अदृश्य था मेरे विचारों का चेहेरा
अब तुम सोचती हो
मुझे तो आता है बस
कागज पर शब्दों कों उतारना

तुम भानाओ के जल की हो वर्षा
मुझ तट के हिरदय के सागर का
काम है
उसे संभाल ,भरकर रखना

तुम्हारी परछाई से बनी है मेरी कल्पना

तुम्हारी कामनाओं की
लहरों की रस्सियों से
मेरे पाँव बंधे है
अब असंभव है मुझ तट का
तुम्हें छोड़कर ज़रा भी सरकना

जो इंतज़ार मे बिछा रहें सतत
उसे ही कहते है तट
इस बात से सब है अवगत
इस सच कों भी अब
तुम मत परखना

तुम्हारी परछाई से बनी है मेरी कल्पना

किशोर

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