रविवार, 17 जनवरी 2010

तुम हो मेरा सम्पूर्ण साक्षात अनुमान


तुम हो मेरा

सम्पूर्ण साक्षात अनुमान

मै करता हू अब ...
तुम्हारी पूजा
क्योकी तुम हो मेरा ज्ञान

अब न रहना दूर मुझसे ॥
न रखना मुझे
अपने से दूर दूजा जान

तुम ही मेरी सम्पूर्णता
खोज रहा था जीसे
अब तक
जग के वन वन मे
मै मान भगवान्

तुम ही हो सत् चित आनंद
मै करू तुम्हारा ...
तुम भी कर लो मेरा ध्यान

तुम ही ममता तुम ही मेरी मित्रता
खोया था जीसे पा लिया
अब चिर निरंतरता मे ...

नही रहा कोई व्यवधान


तुम तम राज से परे
सत् का हो गुणगान
तुम पृथ्वी ,अग्नि ,जल ,वायु ॥
कों धारण किये हुवे हो आकाश

तुम न मन हो ,न अहंकार
न मै पुरुष ,न तुम स्त्री
मै चेतन ...तुम चेतना
अब हुवे है एकाकार

मुझे धन्य कर गया
हे धन्या ...
तेरा मेरे लीये ...
यह निश्छल अगम अगोचर
के जैसा सात्विक अमर प्यार
तुम हो मेरा
सम्पूर्ण साक्षात अनुमान
किशोर

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