मंगलवार, 12 जनवरी 2010

पवित्र है उसका मन

नदी तुम
मंथर गति से बहती हो
कितनी सुन्दर लगती हो तब
लेकीन कभी
उग्र रूप धर
मुझ तट और मेरे प्रिय जनों कों
करती हो नष्ट
तब मै रह जाता हू ..हतप्रभ

तुम्हारी धारा जानती है बचना
मुझ तट की बांहों कों
नही आता लेकीन
उसे अपने बाहुपाश मे कसना

सागर है तुम्हारा स्वप्न
इसलीये
तुम्हें सुरक्षित पहुचाता हू मै
उस तक

तुम्हारे बिना ...प्यास लीये
बिछा रह जाता है
दूर दूर तक
मेरे इंतज़ार के क्षणों सा फैला
मेरा हर कण

नदी है
गति की गीता का
एक् मुक्त छंद
ज्ञान की जड़ता कों
सिखलाती है वह
तरल प्रेम का महा मन्त्र

पवित्र है उसका मन

गाँव हो या शहर
पर्वत हो या वन
सबको रखती है वह स्व्क्छ

वह माँ है
उदगम से समुद्र तक
उसकी इस लम्बी यात्रा मे
बनाना
हमें उसका रक्षक
यही नदी की पूजा होगी
हे मानव जरा समझ
किशोर


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